Jitiya Vrat Pujan Vidhi: उत्तर भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में कुछ त्योहार ऐसे होते हैं जो न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि परिवारिक बंधनों को मजबूत करने वाली भावनाओं का भी जीवंत रूप हैं। इनमें से एक है जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में मनाया जाता है, जहां माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना से इस कठिन उपवास को अपनाती हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को केंद्रित यह तीन दिवसीय पर्व मातृत्व के त्याग और समर्पण की अनुपम कहानी बयां करता है। 2025 में यह व्रत 13 सितंबर से शुरू होकर 15 सितंबर तक चलेगा, जिसमें 14 सितंबर को मुख्य निर्जला उपवास होगा। आइए, इस पावन परंपरा के महत्व, विधि को जानें...
जितिया व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
जितिया व्रत हिंदू धर्म में संतान सुख से जुड़ा एक ऐसा व्रत है, जिसे माताओं द्वारा बच्चों की रक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत संतान की अकाल मृत्यु से बचाव और उनके तेजस्वी जीवन की गारंटी देता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में यह व्रत छठ पूजा के बाद सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें पूरे दिन-रात निर्जला उपवास रखा जाता है।
बिहार के गांवों में यह व्रत सामूहिक रूप से मनाया जाता है, जहां महिलाएं एक-दूसरे के घरों में जमा होकर गीत गाती हैं और कथा सुनती हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों,- जैसे पूर्वांचल में यह व्रत संतान प्राप्ति की इच्छुक महिलाओं के लिए भी विशेष है, जो इसे पहली बार रखकर आशीर्वाद मांगती हैं। वहीं, झारखंड के आदिवासी प्रभावित क्षेत्रों में यह परंपरा स्थानीय लोकगीतों से जुड़कर और जीवंत हो जाती है।
जितिया व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक फैला होता है।
पहला दिन- नहाय-खाय: 13 सितंबर – इस दिन स्नान के बाद एक बार सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।
दूसरा दिन- मुख्य व्रत: 14 सितंबर- निर्जला उपवास और पूजा का प्रमुख दिन।
तीसरा दिन- पारण: 15 सितंबर- अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोला जाता है।
शुभ मुहूर्त के लिए पूजा का समय सुबह 5:04 बजे से शुरू होकर अष्टमी तिथि 15 सितंबर को सुबह 3:06 बजे तक रहेगी। अभिजीत मुहूर्त- लगभग सुबह 11:50 से दोपहर 12:40 तक सबसे उत्तम माना जाता है। पारण का समय अगले दिन सूर्योदय के बाद सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक उपयुक्त है। इन मुहूर्तों का पालन करने से व्रत का फल दोगुना होता है।
पूजा की तैयारी
जितिया व्रत की पूजा विधि सरल लेकिन भावपूर्ण होती है, जो घर के आंगन या पूजा स्थल पर की जाती है। महिलाएं सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
आंगन को गोबर से लीपें और मिट्टी से एक छोटा तालाब बनाएं। इसमें कुशा घास से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित करें। साथ ही, मिट्टी-गोबर से चील और सियारिन की मूर्तियां बनाएं।
पूजा के लिए आवश्यक वस्तुएं
धूप-दीप, रोली, चंदन, फूल, पांच प्रकार के फल, चावल, मिठाई, सिंदूर, कुशा, पान-सुपारी, और सतपुतिया की सब्जी।
पूजा विधि
- सूर्य देव को जल अर्घ्य दें और उनका आह्वान करें।
- जीमूतवाहन की प्रतिमा पर रोली-चंदन लगाएं, धूप-दीप जलाएं, फूल-फल चढ़ाएं।
- चील-सियारिन की मूर्तियों को भी रोली का तिलक लगाएं और आरती उतारें।
- भगवान विष्णु, शिव और सूर्य की भी पूजा करें।
- पूजा के अंत में जितिया व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
- निर्जला उपवास के दौरान रात भर जागरण करें, लोकगीत गाएं।
- नहाय-खाय पर मड़ुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग और तरोई की सब्जी ग्रहण करें।
- पारण पर सतपुतिया की सब्जी और ताजी रोटी खाएं।
- व्रत के दौरान मांसाहार, तामसिक भोजन और झूठ बोलना वर्जित है।