Jitiya Vrat 2025: हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के साथ जितिया व्रत रखती हैं। एक कठिन निर्जला व्रत है, जिसमें माताएं 24 घंटे तक न तो अन्न ग्रहण करती हैं और न ही जल। इस व्रत का महत्व न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और पारिवारिक रूप से भी बहुत गहरा है। अगर आप पहली बार जितिया व्रत रख रही है तो चलिए जानते हैं कि क्या है इस व्रत की की पूजन विधि...
जितिया व्रत का धार्मिक महत्व
जितिया व्रत को हिंदू धर्म में सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर माताओं की संतान को लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। यह व्रत न केवल बच्चों की सुरक्षा के लिए किया जाता है, बल्कि निःसंतान दंपतियों के लिए भी संतान प्राप्ति का आशीर्वाद माना जाता है। इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है, जिन्हें गंधर्व राजा और दयालु शासक के रूप में जाना जाता है। इसके साथ ही चील और सियारिन की मूर्तियों की पूजा भी इस व्रत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो इसकी कथा से जुड़ा हुआ है।
जितिया व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक तीन दिनों तक चलता है। इस साल 2025 में जितिया व्रत 14 सितंबर को मनाया जाएगा। पूजन के लिए शुभ मुहूर्त...
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 14 सितंबर 2025, सुबह 05:04 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 15 सितंबर 2025, सुबह 03:06 बजे
पूजा का शुभ मुहूर्त: 14 सितंबर को सुबह 06:10 बजे से 07:41 बजे
व्रत पारण का समय: 15 सितंबर को सुबह 04:35 बजे से 06:10 बजे
जितिया व्रत की पूजन विधि
जितिया व्रत तीन दिनों की प्रक्रिया है, जिसमें नहाय-खाय, निर्जला व्रत और पारण शामिल हैं...
पहला दिन- नहाय-खाय
- व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय से होती है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। नदी या तालाब में स्नान करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
- स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस दिन कद्दू, चने की दाल और चावल का सेवन पारंपरिक रूप से किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में मडुआ की रोटी और नोनी का साग भी खाया जाता है। तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन से परहेज करें।
- भोजन के बाद भगवान जीमूतवाहन और सूर्यदेव को प्रणाम करें और संतान की लंबी आयु के लिए व्रत का संकल्प लें।
दूसरा दिन- निर्जला व्रत और पूजा
- अष्टमी तिथि को सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा की तैयारी शुरू करें।
- पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर स्वच्छ करें। मिट्टी और गोबर से एक छोटा-सा तालाब बनाएं और उसके पास पाकड़ की टहनी स्थापित करें। यह तालाब भगवान जीमूतवाहन की पूजा के लिए प्रतीकात्मक रूप से बनाया जाता है।
- कुश से भगवान जीमूतवाहन की मूर्ति बनाएं। साथ ही, मिट्टी और गाय के गोबर से चील और सियारिन की छोटी मूर्तियां बनाएं। इन मूर्तियों को पीले और लाल रंग की रुई से सजाएं।
पूजा प्रक्रिया
- प्रदोष काल में पूजा शुरू करें।
- भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारिन की मूर्तियों को मिट्टी के पात्र या तालाब के जल में स्थापित करें।
- धूप, दीप, अक्षत, फूल, माला और नैवेद्य अर्पित करें। मां को 16 की मात्रा में उपरोक्त सामग्री चढ़ाएं।
- जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। यह कथा व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- सूर्यदेव को अर्घ्य दें और मां दुर्गा, लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करें।
- पूजा के बाद पूरे दिन और रात निर्जला व्रत रखें। इस दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण न करें।
तीसरा दिन- व्रत पारण
नवमी तिथि को सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करें। ब्रह्म मुहूर्त में सूर्यदेव को अर्घ्य दें और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें।
सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें। पारंपरिक रूप से मडुआ की रोटी, नोनी का साग और तोरी की सब्जी खाकर व्रत खोला जाता है।
दान-पुण्य- व्रत पारण के बाद यथाशक्ति ब्राह्मणों को दान दें। यह दान भोजन, वस्त्र या धन के रूप में हो सकता है।
जितिया व्रत के नियम