Jitiya 2025: हर मां का सपना होता है कि उसकी संतान स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु हो। इसी मंगल कामना के साथ हिंदू धर्म में जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है, विशेष महत्व रखता है। यह व्रत माताओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए रखा जाता है। खासतौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में यह पर्व बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आइए, जानते हैं जितिया व्रत की पूरी विधि, निर्जला उपवास के नियम, पूजन सामग्री और इसके धार्मिक महत्व के बारे में...
जितिया व्रत का महत्व
जितिया व्रत हिंदू धर्म में एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है, जो आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत तीन दिनों तक चलता है, जिसमें पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन निर्जला उपवास और तीसरा दिन पारण के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी निष्ठा और विधि-विधान से करने से संतान को लंबी आयु, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। इस व्रत का महत्व छठ पूजा के समान माना जाता है, क्योंकि इसमें भी पवित्रता और संयम का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जितिया व्रत की शुरुआत सतयुग में हुई थी। इस व्रत से जुड़ी एक कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की है, जिन्होंने एक मां के पुत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। उनकी इस निस्वार्थ भक्ति के कारण भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और तब से यह व्रत संतान की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए मनाया जाता है।
जितिया व्रत की पूरी विधि
जितिया व्रत तीन दिनों का पर्व है, जिसमें हर दिन की अपनी विशेष विधि और महत्व है। इसे नहाय-खाय, निर्जला उपवास और पारण के रूप में मनाया जाता है।
पहला दिन- नहाय-खाय
इस दिन माताएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करती हैं। यह स्नान नदी, तालाब या घर में ही पवित्र जल से किया जा सकता है। स्नान पवित्रता का प्रतीक है।
स्नान के बाद सात्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें अरवा चावल, अरहर की दाल और बिना लहसुन-प्याज वाली सब्जियां शामिल होती हैं। कुछ क्षेत्रों में मछली का सेवन शुभ माना जाता है, लेकिन यह स्थानीय परंपराओं पर निर्भर करता है।
नहाय-खाय के दिन माताएं भगवान सूर्य को अर्घ्य देती हैं और अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए संकल्प लेती हैं। इस दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, लहसुन और प्याज से परहेज किया जाता है।
दूसरा दिन- निर्जला उपवास और पूजन
यह व्रत का मुख्य दिन होता है, जिसमें माताएं पूरे दिन और रात बिना पानी और भोजन के उपवास रखती हैं। यह कठिन व्रत संतान की लंबी उम्र और सुख के लिए किया जाता है।
पूजा स्थल को गाय के गोबर से लिपकर पवित्र किया जाता है। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन की मूर्ति या तस्वीर स्थापित की जाती है। साथ ही, गाय के गोबर और मिट्टी से चील और सियारिन की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाई जाती हैं।
जितिया व्रत की पूजन सामग्री
जितिया व्रत की पूजा के लिए कई सामग्री की आवश्यकता होती है। इन सामग्रियों को समय से पहले इकट्ठा कर लेना चाहिए ताकि पूजा के दौरान कोई असुविधा न हो..
- भगवान जीमूतवाहन की मूर्ति या तस्वीर, जिसमें कुशा घास से बनी मूर्ति या चित्र को शामिल किया जा सकता है।
- चील और सियारिन की मूर्तियां, जो गाय के गोबर और मिट्टी से बनाई गई हो।
- पूजा के लिए सुगंधित धूप और दीपक।
- पंचामृत- दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण।
- फूल और माला, अक्षत
- चील और सियारिन की मूर्तियों के लिए सिंदूर और कुमकुम।
- पूजा और बच्चों के सिर पर लगाने के लिए सरसों का तेल और खल।
- भोग के लिए फल और मिठाई।
- पूजा में उपयोग के लिए बांस के पत्ते।
- संतान की सुरक्षा के लिए लाल धागा या लॉकेट।
- पूजा के लिए मिट्टी या पीतल का दीपक।
- पूजा सामग्री के रूप में पान और सुपारी।