Guru Purnima: गुरु पूर्णिमा को लेकर हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि गुरु केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे जीवन को सही दिशा देने वाले मार्गदर्शक होते हैं। इसी कारण शास्त्रों में गुरु का स्थान अत्यंत ऊंचा माना गया है। कई धार्मिक ग्रंथों में तो गुरु को भगवान से भी बड़ा बताया गया है, क्योंकि भगवान तक पहुंचने का मार्ग भी गुरु ही दिखाते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष पर्व है।
भारतीय सनातन परंपरा में गुरु को अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने वाला माना गया है। संस्कृत में “गु” का अर्थ अंधकार और “रु” का अर्थ उसका नाश करने वाला बताया गया है। इस दृष्टि से गुरु वह शक्ति हैं जो मनुष्य को सत्य, धर्म और आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।
शास्त्रों में गुरु को सर्वोच्च स्थान
गुरु की महिमा का सबसे प्रसिद्ध उल्लेख गुरु स्तोत्र में मिलता है, जहां कहा गया है...
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
इस श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान बताया गया है। ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, विष्णु पालनकर्ता और महेश संहारकर्ता। गुरु इन तीनों शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि वे व्यक्ति के जीवन में नए ज्ञान का सृजन करते हैं, उसका पालन करते हैं और अज्ञान का नाश करते हैं।
भगवान से भी बड़ा क्यों माना गया गुरु?
शास्त्रों में गुरु को भगवान से भी बड़ा कहने का आशय यह नहीं है कि भगवान का महत्व कम है। इसका अर्थ यह है कि गुरु के बिना भगवान की सही पहचान संभव नहीं होती। भक्त को ईश्वर की ओर ले जाने वाला पहला माध्यम गुरु ही होते हैं।
कई संतों और आचार्यों ने कहा है कि यदि भगवान और गुरु दोनों सामने खड़े हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही भगवान का ज्ञान कराया। संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा इसी भाव को व्यक्त करता है:
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
अर्थात गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही भगवान का मार्ग बताया।
उपनिषदों में गुरु का महत्व
उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि आत्मज्ञान केवल गुरु की शरण में जाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। मुण्डक उपनिषद में उल्लेख है-
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्।
अर्थात सत्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु के पास जाना आवश्यक है। यह कथन दर्शाता है कि आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का मार्ग गुरु के मार्गदर्शन से ही प्रशस्त होता है।
महाभारत और पुराणों में गुरु की महिमा
महाभारत में द्रोणाचार्य का स्थान अत्यंत सम्माननीय बताया गया है। अर्जुन ने अपने गुरु की आज्ञा और शिक्षा को सर्वोपरि माना। इसी प्रकार भागवत पुराण में भी गुरु भक्ति को आध्यात्मिक साधना का अनिवार्य अंग बताया गया है। ऋषि परंपरा में व्यास को आदिगुरु माना जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व भी उन्हीं की जयंती के रूप में मनाया जाता है। वेदों के संकलन और महाभारत की रचना के कारण उन्हें सनातन ज्ञान परंपरा का महान आचार्य माना जाता है।
गुरु केवल शिक्षक नहीं, जीवन मार्गदर्शक
शास्त्रीय दृष्टि से गुरु का कार्य केवल पुस्तक का ज्ञान देना नहीं है। गुरु व्यक्ति के विचार, आचरण और आध्यात्मिक चेतना को विकसित करते हैं। वे धर्म और अधर्म के बीच अंतर समझाते हैं तथा जीवन के कठिन निर्णयों में सही मार्ग दिखाते हैं। भारतीय परंपरा में माता को प्रथम गुरु, पिता को द्वितीय गुरु और विद्या देने वाले आचार्य को तृतीय गुरु माना गया है। इन तीनों के माध्यम से मनुष्य का व्यक्तित्व पूर्ण होता है।
गुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजा की परंपरा