Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में भक्त व्रत, पूजा-पाठ और देवी आराधना के साथ कन्या पूजन भी करते हैं। खासतौर पर अष्टमी और नवमी तिथि पर छोटी कन्याओं को घर बुलाकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कन्याओं में देवी शक्ति का स्वरूप माना जाता है और उनका सम्मान करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। लेकिन नवरात्रि में कन्या पूजन की यह परंपरा क्यों शुरू हुई और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं।
कन्या में देवी का स्वरूप
सनातन धर्म में नारी को शक्ति का स्वरूप माना गया है। इसी भावना के तहत नवरात्रि में छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि बालिकाओं में किसी तरह का छल-कपट नहीं होता और उनका मन सरल तथा पवित्र होता है। इसलिए कन्या पूजन के दौरान उनके चरण धोकर उन्हें सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है।
कन्या पूजन और मां दुर्गा
नवरात्रि में मां दुर्गा को आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। देवी के अलग-अलग स्वरूपों में शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और मातृत्व की भावना जुड़ी हुई है। कन्या पूजन इसी देवी शक्ति के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कन्याओं की पूजा करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्त के घर में सुख-शांति बनी रहती है।
अष्टमी-नवमी पर क्यों पूजन
कन्या पूजन की परंपरा मुख्य रूप से नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि से जुड़ी हुई है। कई परिवार अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, जबकि कुछ जगहों पर नवमी को यह परंपरा निभाई जाती है। कुछ लोग नवरात्रि के पूरे नौ दिनों में भी कन्याओं को भोजन कराते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि नवरात्रि के समापन से पहले कन्याओं के रूप में देवी शक्ति का पूजन करने से देवी आराधना पूर्ण मानी जाती है।
कितनी कन्याओं का पूजन
कन्या पूजन में आमतौर पर 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को भोजन कराया जाता है। धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग संख्या में कन्याओं के पूजन का उल्लेख मिलता है। कई घरों में नौ कन्याओं को नवरात्रि के नौ रूपों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराने की परंपरा है। इस बालक को कई स्थानों पर बटुक भैरव या लांगूर के रूप में माना जाता है।
चरण धोकर किया जाता है स्वागत
कन्या पूजन के दौरान कन्याओं को घर बुलाकर सबसे पहले उनका आदरपूर्वक स्वागत किया जाता है। कई परिवार उनके चरण धोते हैं और फिर उन्हें आसन पर बैठाते हैं। इसके बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है और देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। पूजा के बाद कन्याओं को भोजन कराया जाता है।
हलवा-पूरी का भोग
कन्या पूजन में हलवा, पूरी और चने का प्रसाद विशेष रूप से बनाया जाता है। कई घरों में इसके साथ अन्य सात्विक पकवान भी तैयार किए जाते हैं। मान्यता के अनुसार, कन्याओं को श्रद्धा और प्रेम से भोजन कराने का विशेष महत्व है। भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा और उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
कन्याओं को उपहार देने की परंपरा
कन्या पूजन के बाद बालिकाओं को अपनी श्रद्धा के अनुसार उपहार दिए जाते हैं। इसमें फल, मिठाई, वस्त्र, किताबें, उपयोगी सामग्री या दक्षिणा दी जा सकती है। इसका उद्देश्य केवल उपहार देना नहीं, बल्कि बालिकाओं के प्रति सम्मान और स्नेह प्रकट करना माना जाता है।
क्या है धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से कन्या पूजन को नवरात्रि की देवी आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें कन्या को देवी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि इससे मां दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि आती है। साथ ही यह परंपरा समाज में बेटियों और नारी शक्ति के सम्मान का संदेश भी देती है।
श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण
कन्या पूजन में सबसे अधिक महत्व श्रद्धा और सम्मान का माना जाता है। पूजा की विधि और कन्याओं की संख्या परिवार तथा क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए अपनी कुल परंपरा और मान्यता के अनुसार कन्या पूजन किया जा सकता है। जरूरी यह है कि कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर पूरे सम्मान और प्रेम के साथ भोजन कराया जाए।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)