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Shardiya Navratri: नवरात्रि में दुर्गा मंदिर की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए? जानिए धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shardiya Navratri: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिक्रमा करने का अर्थ अपने आराध्य को स्वयं से सर्वोपरि मानना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।

Shardiya Navratri:
Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने के साथ मंदिर की परिक्रमा करने का भी विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा के मंदिर की परिक्रमा करने से भक्तों को माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है और मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। नवरात्रि के दौरान कई भक्त मंदिर में दर्शन करने के बाद परिक्रमा करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां दुर्गा के मंदिर की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए? क्या परिक्रमा करने की कोई निश्चित संख्या है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं नवरात्रि में दुर्गा मंदिर की परिक्रमा से जुड़ी मान्यताएं।

कितनी बार करनी चाहिए परिक्रमा?

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की परिक्रमा को पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। मां दुर्गा के मंदिर की परिक्रमा के लिए कोई एक निश्चित संख्या सभी परंपराओं में अनिवार्य नहीं मानी गई है। सामान्य रूप से भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार मां दुर्गा की एक, तीन, पांच या सात परिक्रमा करते हैं। कई स्थानों पर तीन या पांच परिक्रमा करने की परंपरा भी प्रचलित है। हालांकि, परिक्रमा की संख्या मंदिर की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए मंदिर में प्रचलित नियमों का पालन करना उचित माना जाता है।

क्या है परिक्रमा का धार्मिक महत्व?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिक्रमा करने का अर्थ अपने आराध्य को स्वयं से सर्वोपरि मानना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है। भक्त मां दुर्गा की परिक्रमा करते समय उनसे सुख-समृद्धि, शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्रि में मां दुर्गा को शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में मंदिर की परिक्रमा को देवी के प्रति समर्पण और आस्था प्रकट करने का एक तरीका माना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और प्रार्थना से भक्त को मानसिक शांति मिलती है।

किस दिशा में करनी चाहिए परिक्रमा?

हिंदू धार्मिक परंपराओं में सामान्य रूप से देवी-देवताओं की परिक्रमा दक्षिणावर्त यानी घड़ी की सुई की दिशा में की जाती है। इसका अर्थ है कि परिक्रमा करते समय देवता या मंदिर का गर्भगृह भक्त के दाहिने ओर रहे। मां दुर्गा के मंदिर में भी आमतौर पर इसी परंपरा का पालन किया जाता है। हालांकि, कुछ मंदिरों में विशेष व्यवस्था या स्थानीय परंपराएं हो सकती हैं। इसलिए परिक्रमा शुरू करने से पहले मंदिर में निर्धारित मार्ग और नियमों का ध्यान रखना चाहिए।

नवरात्रि में परिक्रमा करते समय किन बातों का रखें ध्यान?

नवरात्रि के दौरान मंदिर में दर्शन और परिक्रमा करते समय स्वच्छता, अनुशासन और श्रद्धा का ध्यान रखना चाहिए। परिक्रमा जल्दबाजी में करने के बजाय शांत मन से मां दुर्गा का स्मरण करना उचित माना जाता है। इस दौरान भक्त दुर्गा मंत्र का जाप कर सकते हैं या मन ही मन माता से प्रार्थना कर सकते हैं। मंदिर में भीड़ होने पर दूसरे श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए और निर्धारित रास्ते से ही परिक्रमा करनी चाहिए। इसके अलावा, मंदिर की अपनी कोई विशेष परंपरा हो तो उसका पालन करना चाहिए।

क्या नवरात्रि के नौ दिनों में परिक्रमा करना जरूरी है?

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा करने और मंदिर में दर्शन करने की विशेष मान्यता है, लेकिन प्रत्येक दिन मंदिर जाकर परिक्रमा करना सभी भक्तों के लिए अनिवार्य नहीं है। भक्त अपनी सुविधा, समय और श्रद्धा के अनुसार मां दुर्गा की आराधना कर सकते हैं। जो लोग नवरात्रि में मंदिर जाते हैं, वे दर्शन के बाद अपनी परंपरा के अनुसार परिक्रमा कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में पूजा का मुख्य आधार श्रद्धा, भक्ति और सच्चा भाव माना गया है। इसलिए परिक्रमा की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है कि भक्त मां दुर्गा के प्रति पूरे मन से अपनी आस्था व्यक्त करें।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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