Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में भक्त मां की आराधना कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी को लेकर भी विशेष धार्मिक मान्यता प्रचलित है। मान्यता है कि नवरात्रि में माता रानी किस वाहन पर सवार होकर आ रही हैं और किस वाहन पर विदा हो रही हैं, इसका संबंध आने वाले समय की परिस्थितियों और देश-दुनिया में होने वाली घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि मां दुर्गा की सवारी का निर्धारण कैसे किया जाता है और अलग-अलग वाहनों पर उनके आगमन और प्रस्थान का क्या धार्मिक महत्व है? आइए जानते हैं।
मां दुर्गा की सवारी कैसे तय होती है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी सप्ताह के दिन के आधार पर तय की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन यानी घटस्थापना या कलश स्थापना किस वार को हो रही है, उससे मां के आगमन की सवारी का निर्धारण किया जाता है। इसी तरह नवरात्रि का समापन किस दिन हो रहा है, उसके आधार पर माता रानी की विदाई की सवारी मानी जाती है। हालांकि, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और पंचांगों में इस विषय की व्याख्या में कुछ अंतर भी देखने को मिल सकता है।
किस वाहन पर आती हैं मां दुर्गा?
प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि शारदीय नवरात्रि की शुरुआत रविवार या सोमवार को होती है, तो मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। मंगलवार या शनिवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता रानी का वाहन घोड़ा माना जाता है। वहीं, गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्रि का आरंभ होने पर मां दुर्गा पालकी में सवार होकर आती हैं। बुधवार से नवरात्रि की शुरुआत होने पर माता रानी का आगमन नौका से माना जाता है।
इन वाहनों को केवल सवारी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि धार्मिक परंपराओं में इनके अलग-अलग संकेत भी बताए गए हैं। हाथी को सुख-समृद्धि और अच्छी वर्षा का प्रतीक माना जाता है। घोड़े को गति, परिवर्तन और हलचल से जोड़ा जाता है। पालकी को लेकर कुछ परंपराओं में विशेष परिस्थितियों का संकेत माना जाता है, जबकि नौका को सुख-समृद्धि और कार्यों में सफलता से जोड़कर देखा जाता है।
मां दुर्गा की विदाई की सवारी का क्या है महत्व?
नवरात्रि के अंतिम दिन मां दुर्गा की विदाई की सवारी भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, यदि दशमी तिथि रविवार या सोमवार को पड़ती है, तो मां दुर्गा भैंसे पर सवार होकर विदा होती हैं। इसे कुछ परंपराओं में रोग और कष्ट बढ़ने की आशंका से जोड़कर देखा जाता है। मंगलवार या शनिवार को दशमी होने पर माता रानी का प्रस्थान मुर्गे पर माना जाता है, जिसे दुख और अशांति का संकेत बताया जाता है।
वहीं, बुधवार या शुक्रवार को दशमी पड़ने पर मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर विदा होती हैं। धार्मिक मान्यताओं में हाथी की सवारी को सुख-समृद्धि और अच्छी वर्षा से जोड़ा जाता है। गुरुवार को दशमी होने पर माता रानी का प्रस्थान मनुष्य के कंधे पर माना जाता है। कुछ परंपराओं में इसे सामान्य परिस्थितियों और विभिन्न प्रकार के बदलावों से जोड़कर देखा जाता है।
हाथी पर आगमन और विदाई का संकेत
मां दुर्गा की सवारी में हाथी को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, हाथी स्थिरता, समृद्धि, ऐश्वर्य और अच्छी वर्षा का प्रतीक है। इसलिए जब माता रानी का आगमन या प्रस्थान हाथी पर माना जाता है, तो इसे कृषि, अन्न और आर्थिक समृद्धि के लिहाज से शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। भारत में खेती और वर्षा का जीवन से गहरा संबंध होने के कारण भी हाथी की सवारी को विशेष महत्व दिया जाता है।
घोड़े और पालकी की सवारी का अर्थ
घोड़े को तेज गति और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। प्रचलित मान्यताओं में मां दुर्गा का घोड़े पर आगमन या प्रस्थान राजनीतिक, सामाजिक अथवा प्राकृतिक परिस्थितियों में हलचल से जोड़कर देखा जाता है। दूसरी ओर, पालकी की सवारी को कुछ परंपराओं में विशेष सावधानी और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का संकेत माना जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं को धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखना चाहिए। इनके आधार पर भविष्य की घटनाओं के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
नौका की सवारी क्यों मानी जाती है शुभ?
नौका को जीवन में आगे बढ़ने, सुख-समृद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा का नौका पर आगमन शुभ फल देने वाला माना जाता है। इसे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने और जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की आशा से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, इसका अर्थ अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में भिन्न हो सकता है।
मां दुर्गा की सवारी से जुड़ी मान्यताओं को कैसे समझें?