Krishna Janmashtami: जन्माष्टमी के मौके पर कई जगह दही-हांडी फोड़ने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें युवक और बच्चे मिलकर मानव पिरामिड बनाते हैं और ऊंचाई पर टांगी गई दही-माखन से भरी हांडी को फोड़ते हैं।
Krishna Janmashtami: कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आते ही मंदिरों से लेकर घरों तक श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस दिन भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के साथ उनकी बाल लीलाओं को भी याद किया जाता है। इन्हीं लीलाओं में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है उनकी माखन चोरी की लीला। जन्माष्टमी के मौके पर कई जगह दही-हांडी फोड़ने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें युवक और बच्चे मिलकर मानव पिरामिड बनाते हैं और ऊंचाई पर टांगी गई दही-माखन से भरी हांडी को फोड़ते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर श्रीकृष्ण की माखन चोरी की लीला और दही-हांडी की परंपरा का क्या संबंध है? भगवान कृष्ण को माखन इतना प्रिय क्यों था और जन्माष्टमी पर ही दही-हांडी क्यों फोड़ी जाती है? आइए जानते हैं...
कृष्ण को प्रिय था माखन
पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन मिलता है। बाल्यावस्था में कृष्ण को दूध, दही और माखन बेहद प्रिय माना जाता है। गोकुल में जब कृष्ण अपनी सखाओं के साथ रहते थे, तब वे अक्सर गोपियों के घर पहुंचकर माखन चुराकर खाते थे। कहा जाता है कि यशोदा मैया कृष्ण को माखन खिलाती थीं, लेकिन कृष्ण केवल घर का माखन खाकर संतुष्ट नहीं होते थे। उन्हें गोकुल की गोपियों के घर का माखन भी बहुत पसंद था। यही वजह थी कि वे अपने सखाओं के साथ मिलकर माखन चुराने के लिए गोपियों के घर पहुंच जाते थे।
गोपियां हांडी ऊपर रखने लगीं
कृष्ण की माखन चोरी से परेशान होकर गोकुल की गोपियों ने माखन की हांडी ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया। उनका मानना था कि अगर माखन को ऊंचाई पर रख दिया जाएगा तो कृष्ण वहां तक नहीं पहुंच पाएंगे, लेकिन बाल कृष्ण भी कहां हार मानने वाले थे। वे अपने सखाओं को साथ लेकर हांडी तक पहुंचने का उपाय निकाल लेते थे। कृष्ण और उनके साथी एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते और ऊंचाई पर रखी माखन की हांडी तक पहुंच जाते थे। इसके बाद कृष्ण हांडी फोड़कर उसमें रखा माखन अपने सखाओं के साथ मिलकर खाते थे। उनकी इसी बाल लीला को दही-हांडी की परंपरा से जोड़ा जाता है।
कृष्ण की माखन चोरी की कथा
कृष्ण की माखन चोरी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि गोकुल की गोपियां रोज अपने घर में दूध-दही से माखन निकालती थीं। बाल कृष्ण को जब इसकी खबर मिलती तो वे अपने सखाओं के साथ वहां पहुंच जाते। कृष्ण कभी अकेले माखन चुराते तो कभी अपने मित्रों की मदद लेते। गोपियां माखन को मटकी में भरकर ऊंचाई पर लटका देती थीं, लेकिन कृष्ण किसी न किसी तरह वहां तक पहुंच जाते थे। कई बार गोपियां उनकी शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास भी पहुंचती थीं। कृष्ण अपनी मासूमियत से अपनी मां के सामने सफाई देते और गोपियों की शिकायत को गलत बताते। उनकी इन बाल लीलाओं के कारण कृष्ण का बाल स्वरूप लोगों के बीच बेहद प्रिय माना गया।
जन्माष्टमी से कैसे जुड़ी दही-हांडी
दही-हांडी की परंपरा सीधे तौर पर कृष्ण की इसी बाल लीला की याद दिलाती है। जन्माष्टमी के आसपास कई स्थानों पर दही, माखन और अन्य सामग्री से भरी मटकी को ऊंचाई पर रस्सी के सहारे बांधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां वहां पहुंचती हैं। सभी एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते हैं और सबसे ऊपर पहुंचने वाला व्यक्ति हांडी को फोड़ता है। हांडी फूटते ही दही और माखन नीचे मौजूद लोगों पर गिरता है और लोग इसे भगवान कृष्ण की माखन चोरी की लीला से जोड़कर देखते हैं।
माखन चोरी में छिपी है बाल लीला
श्रीकृष्ण की माखन चोरी को केवल चोरी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह उनकी बाल लीलाओं का हिस्सा मानी जाती है। कृष्ण के बाल स्वरूप की शरारतें, गोपियों के साथ उनका हंसी-मजाक और सखाओं के साथ माखन खाने की कथाएं कृष्ण भक्ति परंपरा में विशेष स्थान रखती हैं। दही-हांडी इसी लीला को उत्सव के रूप में दोहराने का एक माध्यम बन गई है। इसमें बच्चे और युवा कृष्ण की तरह हांडी तक पहुंचने का प्रयास करते हैं।
Trending Video
मटकी में दही-माखन क्यों रखा जाता है
दही-हांडी में मुख्य रूप से दही, माखन और दूध से बनी चीजें रखी जाती हैं। इसकी वजह कृष्ण की बाल लीलाओं में दूध, दही और माखन से जुड़ा उनका विशेष लगाव है। कृष्ण को गोपाल और गोविंद जैसे नामों से भी जाना जाता है। उनका जीवन गोकुल और वहां के गोपालक समुदाय से जुड़ी कथाओं में वर्णित है। इसलिए दही और माखन से जुड़ी परंपराएं कृष्ण की बाल लीलाओं की याद दिलाती हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)