Devraha Baba Death Anniversary: देवरहा बाबा एक महान तपस्वी और सिद्ध योगी थे। उनकी पुण्यतिथि प्रतिवर्ष योगिनी एकादशी के पावन दिन श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।
Devraha Baba Death Anniversary: देवरहा बाबा एक महान तपस्वी और सिद्ध योगी थे। उनकी पुण्यतिथि प्रतिवर्ष योगिनी एकादशी के पावन दिन श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। उन्होंने 19 जून, 1990 को मंगलवार के दिन, उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना नदी के किनारे अपनी देह का त्याग किया। इस खास दिन पर उनके अनुयायी और भक्त एकत्र होकर उनकी स्मृति को सम्मान देते हैं, उनकी शिक्षाओं को हृदय में संजोते हैं और उनके तप, साधना और चमत्कारों से भरे जीवन से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। इस मौके पर श्रद्धालु भक्ति भजनों, कीर्तन, हवन, यज्ञ और प्रार्थनाओं के जरिए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आइए, देवरहा बाबा के जीवन से जुड़ी कुछ विशेष बातों पर नजर डालें...
बाबा कौन थे देवरहा बाबा?
देवरहा बाबा भारत के उन रहस्यमयी और दिव्य संतों में से एक थे, जिनके जीवन और सिद्धियों की कहानियां आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करती हैं। उनका जन्म और जन्मस्थान एक रहस्य है और उनकी आयु के बारे में भी कोई ठोस जानकारी नहीं है। कुछ भक्तों का मानना है कि वे 250 से 500 वर्ष तक जीवित रहे, जबकि अन्य का दावा है कि उनकी आयु 900 वर्ष से भी अधिक थी। वे उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से जुड़े थे और इसी कारण उन्हें देवरहा बाबा नाम मिला।
वे एक सिद्ध योगी, तपस्वी और कर्मयोगी थे, जिन्होंने महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग और हठयोग में महारत हासिल की थी। उनकी खेचरी मुद्रा की सिद्धि विशेष रूप से प्रसिद्ध थी, जिसके बल पर माना जाता है कि वे अपनी भूख और उम्र को नियंत्रित कर सकते थे। बाबा का जीवन अत्यंत सादा और संन्यासी जैसा था। वे भोर में स्नान कर ईश्वर भक्ति और ध्यान में लीन हो जाते थे। उनकी खासियत थी कि वे बिना पूछे भक्तों के मन की बात जान लेते थे और उनकी समस्याओं का समाधान सुझाते थे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि दशकों बाद भी वे किसी व्यक्ति और उसके परिवार के बारे में पूरी जानकारी बता देते थे।
देवरहा बाबा ने अपने जीवन का अधिकांश समय हिमालय में अज्ञात रूप से साधना करते हुए बिताया। बाद में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में आए, जहां उन्होंने सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाला। उनके जीवन का अंतिम पड़ाव वृंदावन में यमुना नदी के तट पर रहा, जहां उन्होंने समाधि ली। माना जाता है कि वे जल पर चल सकते थे, जानवरों की भाषा समझते थे और खतरनाक जंगली जानवरों को पल भर में वश में कर लेते थे। उनकी ये चमत्कारी शक्तियां और सादगी उन्हें एक चमत्कारी बाबा के रूप में प्रसिद्ध करती थीं।
उनकी चौकी कहां-कहां लगती थी?
देवरहा बाबा एक ऊंचे मचान पर विराजमान होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते थे, जो जमीन से 10 से 12 फीट की ऊंचाई पर लकड़ी से बना होता था। उन्होंने काफी समय तक उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सलेमपुर के निकट मइल गांव में सरयू नदी के तट पर अपना आसन जमाया। यहीं से उन्हें देवरहा बाबा का नाम मिला और यह जगह उनके महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक बन गई।
अपने जीवन के अंतिम चरण में वे वृंदावन में यमुना के किनारे बसे, जहां वे एक ऊंचे मंच पर बैठकर भक्तों को आशीर्वाद देते थे। इसी स्थान पर 19 जून, 1990 को उन्होंने जल समाधि ली।
बाबा कुंभ मेले के दौरान अलग-अलग स्थानों पर जाते थे, जहां गंगा और यमुना के किनारों पर उनका आसन लगाया जाता था। वे इन नदियों के तट पर महीने भर तक रुकते थे।
प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद कहा जाता था) के कुंभ मेले में उनकी मौजूदगी खास तौर पर याद की जाती है। फरवरी 1989 में प्रयागराज कुंभ के दौरान उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को अपना समर्थन दिया, और उनके मार्गदर्शन में विश्व हिंदू परिषद ने 9 नवंबर, 1989 को शिलान्यास की तारीख निर्धारित की। अनुयायियों की आस्था है कि मानसून के समय सरयू और यमुना का जलस्तर उनकी मचान तक पहुंचकर नीचे उतरने लगता था, जिसे उनकी अलौकिक शक्तियों का एक और संकेत माना जाता है।
देवरहा बाबा की जनसेवा
देवरहा बाबा हमेशा लोगों की सेवा, गायों की रक्षा, पवित्रता, निष्ठा और सादगी भरे जीवन पर बल देते थे। उनका मानना था कि भारत, जो भगवान राम और श्री कृष्ण की पावन भूमि है, एक दिव्य स्थान है और इसकी सुरक्षा करना हर इंसान का दायित्व है। उनकी दी हुई सीख आज भी अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। 19 जून, 1990 को योगिनी एकादशी के पवित्र दिन, जब यमुना नदी का जल उनकी मचान तक आ पहुंचा, उन्होंने शाम चार बजे इस नश्वर संसार से विदा ली और जल समाधि ग्रहण की।
देवरहा बाबा को पूजती थीं कई बड़ी हस्तियां
देवरहा बाबा के भक्तों की संख्या अनगिनत थी और वे हर वर्ग, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर सभी को आशीर्वाद देते थे। वे अपने पैर भक्तों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देते थे और बताशे, फल या सूखे मेवे प्रसाद के रूप में वितरित करते थे। गरीब, जरूरतमंद और आम लोग उनकी शांति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए उनके पास आते थे। देश के कई प्रमुख राजनेताओं ने उनके दर्शन किए और आशीर्वाद लिया। इनमें भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र और बूटा सिंह शामिल थे। माना जाता है कि आपातकाल के बाद हार का सामना कर रही इंदिरा गांधी ने बाबा से आशीर्वाद लिया और उनके हाथ के पंजे से आशीर्वाद देने की मुद्रा ने कांग्रेस पार्टी को हाथ का पंजा चुनाव चिह्न चुनने के लिए प्रेरित किया।
ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम भी उनके दर्शन के लिए देवरिया के मइल गांव आए थे, जब उनके भाई ने उन्हें भारत के सिद्ध योगी से मिलने की सलाह दी थी। महामना मदन मोहन मालवीय और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे विद्वान भी उनके सामने नतमस्तक हुए। बाबा के योग और आध्यात्मिक ज्ञान से संत और साधु भी प्रेरित होते थे। बॉलीवुड के कलाकार और बड़े-बड़े अधिकारी भी उनकी शरण में आते थे, उनकी सादगी और दिव्य शक्तियों से प्रभावित होकर।