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Bhasma Sur: भस्मासुर कौन था , जिसके वध के लिए भगवान विष्णु ने लिया स्त्री का अवतार

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhasma Sur : भगवान शिव, जिन्हें देवों के देव महादेव के नाम से जाना जाता है, अजर-अमर और अनंत हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं, सभी देवी-देवताओं के जन्म की कहानियाँ हैं, लेकिन सिर्फ़ भगवान शिव ही अजन्मे हैं।

 Bhasma Sur
 Bhasma Sur : भगवान शिव, जिन्हें देवों के देव महादेव के नाम से जाना जाता है, अजर-अमर और अनंत हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं, सभी देवी-देवताओं के जन्म की कहानियाँ हैं, लेकिन सिर्फ़ भगवान शिव ही अजन्मे हैं। मतलब, वे इस ब्रह्मांड के बनने से पहले से थे, और जब यह खत्म होगा, तब भी सिर्फ़ महादेव ही रहेंगे। इससे भगवान शिव की ताकत का भी पता चलता है। लेकिन क्या आप उस राक्षस के बारे में जानते हैं जिसने डर के मारे खुद महादेव को भगा दिया था? अगर नहीं! तो चलिए हम आपको यह अनोखी कहानी बताते हैं।

भस्मासुर कौन था ?

भस्मासुर स्वभाव से क्रूर था, लेकिन वह ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्तियों को अपने वश में करना चाहता था। अमर होने और देवताओं पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से उसने भगवान शिव की घोर तपस्या शुरू की। उसने वर्षों तक अन्न-जल का त्याग कर दिया और केवल शिव के नाम का जाप करता रहा।

भगवान शिव, जिन्हें 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) कहा जाता है, भस्मासुर की इस कठिन तपस्या से प्रसन्न हो गए। शिव जी उसके सामने प्रकट हुए और उससे मनचाहा वरदान मांगने को कहा।

भस्मासुर अत्यंत चतुर और दुष्ट बुद्धि का था। उसने अमरता का वरदान मांगना चाहा, लेकिन चूंकि प्रकृति के नियम के अनुसार मृत्यु निश्चित है, इसलिए उसने एक अनोखा वरदान मांगा:

"हे प्रभु! मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जिसके भी सिर पर अपना हाथ रखूं, वह तुरंत जलकर भस्म (राख) हो जाए।"

औघड़दानी और भोलेनाथ होने के कारण भगवान शिव ने बिना उसके परिणामों का विचार किए, 'तथास्तु' कह दिया और उसे यह चमत्कारी व भयानक शक्ति प्रदान कर दी। इसी वरदान के कारण उसका नाम 'भस्मासुर' पड़ा।

सकंट में पड़े भगवान शिव 


वरदान मिलते ही भस्मासुर के भीतर का राक्षस पूरी तरह जाग उठा। वह अपनी शक्ति की परीक्षा लेना चाहता था। उसने सोचा कि क्यों न इस शक्ति का परीक्षण स्वयं वरदान देने वाले भगवान शिव पर ही किया जाए। यदि वह शिव को भस्म कर देता, तो वह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली जीव बन जाता और माता पार्वती को भी अपनी पत्नी बना सकता था।दुष्ट भस्मासुर ने भगवान शिव की ओर हाथ बढ़ाकर उन्हें भस्म करने की कोशिश की। शिव जी भस्मासुर के इस विश्वासघात और कृतघ्नता को देखकर स्तब्ध रह गए। अपनी रक्षा के लिए भगवान शिव वहां से भागे।भस्मासुर उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। शिव जी भागते हुए आकाश, पृथ्वी और पाताल लोक तक गए, लेकिन राक्षस ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंततः शिव जी भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनसे इस संकट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार

भगवान विष्णु जानते थे कि भस्मासुर को किसी सीधे युद्ध में हराना असंभव था, क्योंकि उसके पास शिव का अमोघ वरदान था। इसलिए, विष्णु जी ने कूटनीति और माया का सहारा लेने का निर्णय लिया।विष्णु जी ने एक अत्यंत सुंदर, लावण्यमयी और मनमोहक नर्तकी का रूप धारण किया, जिसे 'मोहिनी' कहा गया। मोहिनी रूप में विष्णु जी उस मार्ग में आकर खड़े हो गए जहाँ से भस्मासुर शिव जी का पीछा करते हुए गुजरने वाला था।जैसे ही भस्मासुर की नजर मोहिनी पर पड़ी, वह उसके अलौकिक सौंदर्य को देखकर सब कुछ भूल गया। वह कामुकता और वासना के वश में हो गया। उसने शिव को मारने का विचार छोड़ दिया और मोहिनी के पास जाकर उससे विवाह का प्रस्ताव रखा।

  भस्मासुर का अंत

मोहिनी ने मुस्कुराते हुए भस्मासुर से कहा, "मैं एक नर्तकी हूँ और मुझे नृत्य से अत्यंत प्रेम है। मैं केवल उसी पुरुष से विवाह कर सकती हूँ जो नृत्य कला में निपुण हो और मेरे जैसे कदम से कदम मिला सके। यदि तुम मेरे जैसी हुबहू नकल करके नृत्य कर सको, तो मैं तुम्हारी पत्नी बनने को तैयार हूँ।"काम के मद में अंधा हो चुका भस्मासुर तुरंत तैयार हो गया। वह भूल गया कि उसके हाथों में क्या शक्ति है।मोहिनी ने नृत्य करना शुरू किया। वह जैसे-जैसे अपने हाथ और पैर हिलाती, भस्मासुर भी ठीक वैसी ही मुद्राएं बनाने लगा। मोहिनी ने उसे अपने इशारों पर नचाते हुए पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर दिया।नृत्य के चरम क्षण में, मोहिनी ने एक ऐसी मुद्रा बनाई जिसमें उसने अपना दायां हाथ अपने ही सिर पर रख लिया। भस्मासुर मोहिनी की सुंदरता और नृत्य की लय में इतना खो चुका था कि उसने बिना सोचे-समझे ठीक उसी मुद्रा को दोहराया और अपना हाथ अपने ही सिर पर रख लिया।जैसे ही उसका हाथ उसके सिर से छुआ, भगवान शिव का वरदान सच हो गया। भस्मासुर के शरीर से भयानक अग्नि निकली और वह पल भर में जलकर राख (भस्म) का ढेर बन गया। इस प्रकार, उस भयानक राक्षस का अंत उसी की मूर्खता और वरदान के कारण हुआ।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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