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Ahoi Ashtami : अहोई अष्टमी पर क्यों पहनी जाती है स्याहु माला, जानिए धार्मिक महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

 Ahoi Ashtami :  अहोई अष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों और त्योहारों में से एक है। यह व्रत बच्चों की भलाई और उनकी लंबी उम्र की कामना के लिए रखा जाता है। यह करवा चौथ के चौथे दिन, यानी कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।

 Ahoi Ashtami :
 Ahoi Ashtami :  अहोई अष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों और त्योहारों में से एक है। यह व्रत बच्चों की भलाई और उनकी लंबी उम्र की कामना के लिए रखा जाता है। यह करवा चौथ के चौथे दिन, यानी कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। माताएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र, समृद्धि और खुशी के लिए यह व्रत रखती हैं। इस दिन माताएं मुख्य रूप से 'अहोई माता' की पूजा करती हैं और अपने बच्चों की भलाई के लिए पूरे दिन 'निर्जला' व्रत  रखती हैं।अहोई अष्टमी की पूजा में 'अहोई माता' की कथा सुनना और 'स्याहू मंगल'  पहनना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरा के अनुसार, इस 'स्याहू मंगल' को पहने बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं कि यह 'मंगल' क्या है और इसे पहनने का सही तरीका क्या है।

अहोई अष्टमी पर 'स्याहू मंगल' क्यों पहना जाता है?

माताएं इस प्रार्थना के साथ 'स्याहू मंगल' पहनती हैं कि उनके बच्चे लंबी उम्र तक जिएं; माना जाता है कि इसे पहनने से बच्चों पर अहोई माता का आशीर्वाद बना रहता है। परंपरा के अनुसार इस 'मंगल' को कुछ समय तक पहने रखना होता है कम से कम इसे दिवाली तक तो पहनना ही चाहिए। इसमें चांदी के मनके होते हैं और हर साल इसमें एक नया चांदी का मनका जोड़ा जाता है। यह मनका बच्चों की उम्र से जुड़ा होता है।

'स्याहू मंगल' का क्या महत्व है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी पर 'स्याहू मंगल' पहनना बच्चों की सुरक्षा, खुशी और समृद्धि से जुड़ा है। यह अहोई माता के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है और बच्चों की भलाई के लिए की गई एक प्रार्थना है। परंपरा के अनुसार इस 'मंगल' में चांदी के मनके या मोती होते हैं हर साल इसमें एक नया मनका जोड़ा जाता है जो अक्सर बच्चों की संख्या के बराबर होता है और माना जाता है कि इससे बच्चों की लंबी उम्र होती है।

'स्याहू मंगल' कैसे तैयार किया जाता है?

इस 'मंगल' को तैयार करने के लिए, अहोई अष्टमी के दिन व्रत रखने वाली माताएं मिट्टी से एक प्रतीकात्मक जलाशय बनाती हैं। इसके बाद, 'स्याहू मंगल' तैयार किया जाता है और इसे बच्चों के पास रखा जाता है। 'स्याहू मंगल' तैयार हो जाने के बाद मिट्टी के बर्तनों की मदद से बच्चों पर पानी छिड़का जाता है। इसे बनाने के लिए, एक लाल पवित्र धागे में चांदी का 'स्याहू' पेंडेंट पिरोया जाता है, और फिर एक-एक करके अन्य मनके जोड़े जाते हैं।

अहोई अष्टमी पर 'स्याहू' पहनने का सही तरीका:

अहोई अष्टमी की सुबह स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनें। पूरे दिन 'निर्जला' व्रत रखने का संकल्प लें और अहोई माता की पूजा की तैयारी करें।
अहोई माता की तस्वीर या पूजा स्थल के सामने, तैयार किए गए 'स्याहू मंगल' को अपने हाथों में लेकर, देवी से अपने बच्चों की भलाई, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।
'स्याहू मंगल' में आमतौर पर चांदी के मनके होते हैं कुछ परंपराओं में, मनकों की संख्या बच्चों की संख्या के बराबर होती है।
पूजा के बाद अपने परिवार की परंपराओं के अनुसार 'स्याहू' पहनें और ध्यान रखें कि इसे कम से कम आठ दिनों तक यानी दिवाली तक पहने रखना चाहिए।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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