Adhik Jyeshtha Amavasya: अधिक मास में आने वाली अधिक ज्येष्ठ अमावस्या का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। अमावस्या तिथि को पितरों की तिथि माना जाता है और इस दिन स्नान, दान, तर्पण तथा पितरों के निमित्त किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है। जब अमावस्या अधिक मास में आती है, तब इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु का पूजन करने तथा पितरों के निमित्त तर्पण और कथा का श्रवण-पाठ करने से पितृ दोष शांत होता है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पुराणों में वर्णित है कि अधिक मास स्वयं भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस कारण अधिक ज्येष्ठ अमावस्या पर किए गए धार्मिक अनुष्ठान, जप, तप, दान और व्रत विशेष फलदायी माने गए हैं। इस दिन कई श्रद्धालु पितरों की शांति के लिए व्रत रखते हैं और व्रत कथा का पाठ करते हैं।
अधिक ज्येष्ठ अमावस्या व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक धर्मपरायण ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था। वह वेदों का ज्ञाता और भगवान विष्णु का भक्त था। उसके घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी, लेकिन कुछ समय बाद उसके परिवार पर विपत्तियों का दौर शुरू हो गया। घर में आर्थिक संकट आने लगा, परिवार के सदस्य बार-बार बीमार पड़ने लगे और किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती थी।
ब्राह्मण ने अनेक उपाय किए, यज्ञ-हवन करवाए, देवताओं की पूजा की, लेकिन कष्ट कम नहीं हुए। अंततः वह एक महान तपस्वी ऋषि के आश्रम में पहुंचा और अपनी पीड़ा सुनाई। ऋषि ने ध्यान लगाकर उसके कष्टों का कारण जानने का प्रयास किया। ध्यान से उठने के बाद ऋषि ने कहा कि उसके कुल के कुछ पितर असंतुष्ट हैं और उन्हीं की अप्रसन्नता के कारण परिवार को निरंतर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
ब्राह्मण ने विनम्रता से पूछा कि पितरों को संतुष्ट करने का उपाय क्या है। तब ऋषि ने कहा कि अधिक मास में आने वाली अमावस्या का व्रत करो, भगवान विष्णु का पूजन करो और पितरों के निमित्त श्रद्धा से तर्पण तथा दान करो। साथ ही अमावस्या व्रत कथा का श्रवण और पाठ अवश्य करो। इससे पितरों को तृप्ति मिलेगी और उनके आशीर्वाद से सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।
ऋषि के वचन सुनकर ब्राह्मण अपने घर लौटा और अधिक ज्येष्ठ अमावस्या की प्रतीक्षा करने लगा। जब वह पावन तिथि आई तो उसने प्रातःकाल पवित्र नदी में स्नान किया। स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की, दीप प्रज्वलित किया, तुलसी दल अर्पित किए और विष्णु मंत्रों का जप किया। इसके बाद उसने अपने पितरों का स्मरण करते हुए तिल, जल और कुश से तर्पण किया। श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा सामर्थ्य के अनुसार दान दिया। दिनभर व्रत रखकर भगवान विष्णु की कथा और अमावस्या व्रत कथा का श्रवण किया।
कहा जाता है कि उसी रात्रि ब्राह्मण ने स्वप्न में अपने पितरों को देखा। उसके पूर्वज अत्यंत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा कि अधिक ज्येष्ठ अमावस्या के व्रत, तर्पण और दान से उन्हें संतोष प्राप्त हुआ है। अब वे प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं। पितरों ने कहा कि उसके परिवार के कष्ट शीघ्र समाप्त हो जाएंगे और घर में पुनः सुख-समृद्धि का आगमन होगा।
स्वप्न समाप्त होने के बाद ब्राह्मण की आंख खुली। वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और भगवान विष्णु का स्मरण करने लगा। कुछ ही समय बाद उसके जीवन में परिवर्तन दिखाई देने लगा। परिवार के रोग दूर होने लगे, आर्थिक स्थिति सुधरने लगी और सभी कार्य सफल होने लगे। ब्राह्मण ने समझ लिया कि यह सब पितरों की कृपा और अधिक ज्येष्ठ अमावस्या व्रत के प्रभाव से हुआ है।
पितरों की तृप्ति से जुड़ी दूसरी पौराणिक कथा
पुराणों में एक अन्य कथा का भी उल्लेख मिलता है। एक राजा अपने राज्य का संचालन धर्मपूर्वक करता था, लेकिन उसके वंश में संतान नहीं थी। इस कारण वह अत्यंत चिंतित रहता था। अनेक यज्ञ और अनुष्ठान कराने के बाद भी उसे संतान प्राप्ति नहीं हुई।
एक दिन राज्य में पधारे एक महात्मा ने राजा को बताया कि उसके कुछ पूर्वजों की इच्छाएं अधूरी रह गई थीं, जिसके कारण वे पूर्ण संतुष्ट नहीं हैं। महात्मा ने राजा को अधिक मास की अमावस्या पर विशेष व्रत करने, पितरों का तर्पण करने और ब्राह्मणों को दान देने की सलाह दी।
राजा ने महात्मा के निर्देशानुसार अधिक ज्येष्ठ अमावस्या का व्रत रखा। उसने नदी तट पर जाकर पितरों का विधिपूर्वक तर्पण किया, गरीबों को अन्न और वस्त्र दान दिए तथा भगवान विष्णु का पूजन किया। कहा जाता है कि इस अनुष्ठान से उसके पितर प्रसन्न हुए और कुछ समय बाद राजा को योग्य संतान की प्राप्ति हुई, तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि अधिक मास की अमावस्या पर श्रद्धापूर्वक किए गए पितृ कर्म विशेष फल प्रदान करते हैं और पितरों की कृपा प्राप्त होती है।
व्रत कथा के पाठ का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक ज्येष्ठ अमावस्या के दिन व्रत कथा का श्रवण और पाठ करने से पितरों का स्मरण होता है। इस दिन भगवान विष्णु और पितरों की आराधना एक साथ की जाती है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, इसलिए इस दिन विष्णु पूजन के साथ पितृ तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है।
कथा का पाठ करते समय श्रद्धा और भक्ति का भाव रखना आवश्यक माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि जो व्यक्ति अधिक ज्येष्ठ अमावस्या पर व्रत रखकर इस कथा का पाठ करता है तथा पितरों के निमित्त तर्पण करता है, उसके पितर संतुष्ट होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
अधिक ज्येष्ठ अमावस्या पर करें ये धार्मिक कार्य
अधिक ज्येष्ठ अमावस्या के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात पितरों का स्मरण कर तिल, कुश और जल से तर्पण किया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन पीपल वृक्ष की पूजा भी करते हैं। ब्राह्मण भोजन, अन्नदान, वस्त्रदान और दक्षिणा देने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में आने वाली अमावस्या पर किए गए पितृ कर्म सामान्य अमावस्या की अपेक्षा अधिक फलदायी माने गए हैं। यही कारण है कि इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र नदियों और तीर्थस्थलों पर जाकर स्नान, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं तथा व्रत कथा का पाठ कर पितरों की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)