Shiv Bhakti : एक समय की बात है, जब अनेक महर्षि और मुनि भगवान शिव की भक्ति का रहस्य जानने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से पूछा कि ऐसा कौन-सा मार्ग है, जिससे मनुष्य भगवान शंकर की सच्ची कृपा प्राप्त कर सकता है
Shiv Bhakti : एक समय की बात है, जब अनेक महर्षि और मुनि भगवान शिव की भक्ति का रहस्य जानने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से पूछा कि ऐसा कौन-सा मार्ग है, जिससे मनुष्य भगवान शंकर की सच्ची कृपा प्राप्त कर सकता है और जीवन के बंधनों से मुक्त हो सकता है। तब ब्रह्मा जी ने शांत और गंभीर स्वर में कहा कि भगवान शंकर की पूजा केवल बाहरी विधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह हृदय की गहराई से जुड़ी साधना है। उन्होंने बताया कि जब कोई व्यक्ति निरंतर भगवान शिव के नाम, रूप, गुण और लीलाओं का अपने मन में चिंतन करता है, तो उसे मनन कहा जाता है।
यह मनन तभी संभव होता है, जब स्वयं भगवान की कृपा दृष्टि प्राप्त हो। ब्रह्मा जी ने आगे कहा कि जब भक्त प्रेमपूर्वक वेदवाणी, संगीत या सरल भाषा में भगवान शंकर की महिमा का गान करता है, तो उसे कीर्तन कहते हैं। इसी प्रकार जब किसी व्यक्ति के कान भगवान शिव से जुड़ी कथाओं, स्तुतियों और नामों को सुनने में लग जाते हैं, तो उसे श्रवण कहा जाता है।
उन्होंने समझाया कि जैसे लोहे का टुकड़ा धीरे-धीरे चुम्बक की ओर खिंच जाता है, वैसे ही जब मनुष्य का मन शिव-कथा में रम जाता है, तो वह स्वयं ईश्वर की ओर आकर्षित हो जाता है। ब्रह्मा जी ने यह भी बताया कि पहले सज्जनों की संगति से श्रवण की आदत बनती है, फिर कीर्तन में रुचि बढ़ती है और अंत में मनन उत्पन्न होता है। परंतु यह तीनों साधन केवल भगवान शिव की कृपा से ही पूर्ण होते हैं।
सूत गोस्वामी जी ने ऋषियों को इन साधनों का महत्व समझाने के लिए एक प्राचीन कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि एक समय उनके गुरुदेव महर्षि वेदव्यास सरस्वती नदी के तट पर तपस्या कर रहे थे। वे गहरे ध्यान में लीन रहते थे और मुक्ति के सत्य को जानने के लिए निरंतर साधना करते थे। एक दिन आकाश से एक दिव्य विमान उतरा और उसमें से ब्रह्मा के पुत्र भगवान सनतकुमार प्रकट हुए। उनका तेज सूर्य के समान था और उनके मुख पर दिव्य शांति झलक रही थी। वेदव्यास जी ने उन्हें देखकर तुरंत उठकर प्रणाम किया, उन्हें आसन दिया और आदरपूर्वक उनका स्वागत किया।
सनतकुमार प्रसन्न होकर बोले कि हे व्यास, तुम पूरे हृदय से भगवान शंकर का ध्यान करो, वही तुम्हें मार्ग दिखाएँगे। तब वेदव्यास जी ने विनम्रता से कहा कि उन्होंने वेदों के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कथाएँ संसार को दी हैं, फिर भी उनके भीतर मुक्ति का पूर्ण ज्ञान क्यों नहीं जागा, यह उन्हें समझ में नहीं आता। वे इसी कारण तपस्या कर रहे हैं। तब सनत कुमार ने उन्हें बताया कि भगवान शिव का श्रवण, कीर्तन और मनन ही मोक्ष का सच्चा मार्ग है। उन्होंने कहा कि यह ज्ञान उन्हें स्वयं भगवान नन्दीश्वर से मिला था और उन्हें यह भगवान शिव ने प्रदान किया था। इसलिए यह मार्ग पूर्णतः प्रमाणिक और प्रभावशाली है।
सनत कुमार ने वेदव्यास जी को समझाया कि यदि कोई व्यक्ति जीवन भर इन तीन साधनों का अभ्यास करता है, तो उसका हृदय धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। श्रवण से मन में श्रद्धा जन्म लेती है, कीर्तन से प्रेम बढ़ता है और मनन से आत्मा ईश्वर से जुड़ जाती है। जब मनुष्य इन तीनों को संतुलित रूप से अपनाता है, तो उसके भीतर से अहंकार, लोभ और मोह नष्ट होने लगते हैं।
वह संसार में रहते हुए भी बंधनों से मुक्त हो जाता है। सनतकुमार के उपदेश सुनकर वेदव्यास जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने जीवन भर इस मार्ग का पालन किया। इसके बाद सनतकुमार अपने विमान से ब्रह्मधाम लौट गए। सूत गोस्वामी जी ने आगे कहा कि जो मनुष्य सच्चे मन से शिव कथा सुनता है, प्रेमपूर्वक उनका नाम गाता है और हृदय में उनका ध्यान करता है, वह निश्चित रूप से शिवलोक को प्राप्त करता है।
ऐसे भक्त के लिए मोक्ष दूर नहीं रहता, क्योंकि भगवान शंकर स्वयं उसके मार्गदर्शक बन जाते हैं। ऋषियों ने यह कथा सुनकर सूत जी को प्रणाम किया और निश्चय किया कि वे भी अपने जीवन में श्रवण, कीर्तन और मनन को अपनाकर शिव कृपा प्राप्त करेंगे। इस प्रकार यह तीनों साधन मनुष्य को सांसारिक बंधनों से निकालकर परम शांति और मुक्ति की ओर ले जाते हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)