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Treta Yuga: त्रेतायुग में कैसी थी धर्म की व्यवस्था, जानिए विष्णु पुराण में क्या है जिक्र

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Vedic Religion: त्रेतायुग धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का युग था। यद्यपि सतयुग की तुलना में धर्म का एक चरण कम हो गया था, फिर भी समाज में सत्य, न्याय, दया, तप, दान और यज्ञ की परंपरा मजबूत बनी हुई थी। 

Treta Yuga
Treta Yuga History: सनातन धर्म में चार युगों का वर्णन मिलता है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इन चारों युगों में धर्म, समाज और मानव जीवन की स्थिति अलग-अलग बताई गई है। इनमें त्रेतायुग को ऐसा युग माना जाता है, जब धर्म अपनी पूर्णता से थोड़ा कम होकर भी मजबूत स्थिति में था। विष्णु पुराण, भागवत पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य प्राचीन ग्रंथों में त्रेतायुग की धार्मिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन और राजा के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

विष्णु पुराण के अनुसार, त्रेतायुग में धर्म के चार चरणों में से तीन चरण शेष रहते हैं। अर्थात धर्म मजबूत था, लेकिन सतयुग जैसी पूर्णता नहीं रह गई थी। इस युग में यज्ञ, तप, दान, सत्य, मर्यादा और कर्तव्य पालन को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। भगवान विष्णु ने भी इसी युग में श्रीराम के रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का संदेश दिया।

विष्णु पुराण में त्रेतायुग का स्वरूप

विष्णु पुराण में बताया गया है कि सतयुग के बाद जब त्रेतायुग का आरंभ हुआ, तब मनुष्यों के स्वभाव में कुछ परिवर्तन आने लगे। लोगों में इच्छाएं और भौतिक आवश्यकताएं बढ़ने लगीं, लेकिन फिर भी वे धर्म के मार्ग पर चलते थे। इस युग में सत्य का महत्व बना रहा, हालांकि कुछ स्थानों पर असत्य और अधर्म भी दिखाई देने लगा था। धर्म के चार आधारों में से एक आधार कम हो जाने के कारण मनुष्य को अपने जीवन में अधिक प्रयास करना पड़ता था। फिर भी लोग ईश्वर में आस्था रखते थे और धार्मिक नियमों का पालन करते थे।
 
भगवान विष्णु

धर्म के तीन चरणों पर टिका था समाज

विष्णु पुराण के अनुसार त्रेतायुग में धर्म तीन चरणों पर स्थित था। इसका अर्थ है कि समाज में सत्य, दया और तप जैसी विशेषताओं का प्रभाव अधिक था। लोगों के मन में लोभ और क्रोध का प्रभाव सीमित था। अधिकांश लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते थे और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते थे। इस युग में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवन के प्रत्येक कार्य में धर्म का पालन आवश्यक माना जाता था। परिवार, समाज, राज्य और व्यक्तिगत जीवन सभी धर्म के नियमों के अनुसार संचालित होते थे।

यज्ञों का विशेष महत्व

त्रेतायुग की सबसे बड़ी धार्मिक विशेषता यज्ञों की प्रधानता थी। विष्णु पुराण में अनेक प्रकार के यज्ञों का उल्लेख मिलता है। उस समय राजा और सामान्य गृहस्थ दोनों अपनी क्षमता के अनुसार यज्ञ करते थे। माना जाता था कि यज्ञ करने से देवता प्रसन्न होते हैं, वर्षा समय पर होती है, अन्न की वृद्धि होती है और समाज में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि समाज को एकजुट करने का माध्यम भी था। यज्ञों के दौरान विद्वान, ऋषि और साधु एकत्रित होकर वेदों का ज्ञान देते थे और लोगों को धर्म का मार्ग बताते थे।

राजा का सबसे बड़ा धर्म था प्रजा की रक्षा

विष्णु पुराण में राजा को धर्म का रक्षक बताया गया है। राजा का पहला कर्तव्य अपनी प्रजा की सुरक्षा करना और न्याय स्थापित करना था। यदि कोई व्यक्ति अधर्म करता था तो राजा उसे उचित दंड देता था। राजा स्वयं भी धर्म का पालन करता था ताकि प्रजा उसके आचरण से प्रेरणा ले सके। इसी कारण श्रीराम को "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहा जाता है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख से अधिक महत्व धर्म और राज्य की मर्यादा को दिया। त्रेतायुग में आदर्श शासन व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण रामराज्य माना जाता है।


 

वर्ण और आश्रम व्यवस्था का पालन

त्रेतायुग में समाज वर्ण और आश्रम व्यवस्था के अनुसार व्यवस्थित था। विष्णु पुराण के अनुसार यह व्यवस्था समाज में संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से थी। ब्राह्मणों का कार्य शिक्षा और यज्ञ कराना, क्षत्रियों का कार्य रक्षा करना, वैश्य कृषि, पशुपालन और व्यापार करना तथा शूद्र सेवा कार्यों में सहयोग देना था। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों का भी पालन किया जाता था। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के चरण के अनुसार धर्म और कर्तव्यों का पालन करता था।

ऋषि-मुनियों का समाज में महत्वपूर्ण स्थान

त्रेतायुग में ऋषि और मुनि समाज के मार्गदर्शक थे। वे जंगलों में आश्रम बनाकर तपस्या करते थे और विद्यार्थियों को वेद, शास्त्र, नीति तथा धर्म की शिक्षा देते थे। राजा भी समय-समय पर उनके पास जाकर सलाह लेते थे। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि, भारद्वाज और अगस्त्य जैसे महान ऋषियों ने इस युग में धर्म की स्थापना और समाज के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके आश्रम शिक्षा और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रमुख केंद्र थे।

तप और संयम को माना जाता था महान धर्म

विष्णु पुराण में तपस्या को त्रेतायुग का महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य बताया गया है। ऋषि-मुनि वर्षों तक कठोर तप करके आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करते थे। सामान्य लोग भी व्रत, उपवास और संयम का पालन करते थे। इंद्रियों पर नियंत्रण, सादा जीवन और सत्य का पालन प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक माना जाता था। धर्म का उद्देश्य केवल स्वर्ग प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ईश्वर की प्राप्ति भी था।
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दान और सेवा का विशेष महत्व

त्रेतायुग में दान को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता था। लोग अपनी आय और संपत्ति का कुछ भाग जरूरतमंदों, ब्राह्मणों, ऋषियों और निर्धनों को दान करते थे। अन्नदान, गोदान, वस्त्रदान और भूमि दान का विशेष महत्व था। दान करते समय किसी प्रकार का अहंकार नहीं रखा जाता था। माना जाता था कि निस्वार्थ भाव से किया गया दान ही वास्तविक धर्म है। सेवा और परोपकार को भी धर्म का अभिन्न अंग माना जाता था।

परिवार और सामाजिक मर्यादा

त्रेतायुग में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई था। माता-पिता का सम्मान, गुरु की आज्ञा का पालन, पति-पत्नी के बीच विश्वास और भाई-भाई के प्रेम को धर्म का हिस्सा माना जाता था। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जीवन पारिवारिक आदर्शों का सर्वोत्तम उदाहरण है। भगवान राम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया, जबकि भरत ने सिंहासन पर बैठने के बजाय राम की खड़ाऊं को राजसिंहासन पर स्थापित कर राज्य चलाया। ये घटनाएं बताती हैं कि उस समय धर्म केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि जीवन की मर्यादा था।

अधर्म का भी होने लगा था उदय

विष्णु पुराण में यह भी बताया गया है कि त्रेतायुग में अधर्म पूरी तरह समाप्त नहीं था। रावण, खर-दूषण, मारीच और अन्य राक्षसों ने अपने अहंकार और अत्याचार से धर्म को चुनौती दी। जब अधर्म बढ़ा, तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा की। रावण का वध केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक माना जाता है। इससे यह संदेश मिलता है कि जब भी अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा करते हैं।
 
भगवान विष्णु

भगवान श्रीराम का जीवन बना धर्म का आदर्श

त्रेतायुग की धार्मिक व्यवस्था को समझने के लिए भगवान श्रीराम का जीवन सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। उन्होंने पुत्र, भाई, पति, मित्र और राजा के रूप में हर संबंध की मर्यादा निभाई। उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए धर्म का त्याग नहीं किया। श्रीराम का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा करना नहीं, बल्कि सत्य बोलना, न्याय करना, वचन निभाना और दूसरों के हित का ध्यान रखना भी है। यही कारण है कि आज भी रामराज्य को आदर्श शासन और आदर्श समाज का प्रतीक माना जाता है।

धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का युग 

विष्णु पुराण के अनुसार त्रेतायुग धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का युग था। यद्यपि सतयुग की तुलना में धर्म का एक चरण कम हो गया था, फिर भी समाज में सत्य, न्याय, दया, तप, दान और यज्ञ की परंपरा मजबूत बनी हुई थी। राजा धर्म के अनुसार शासन करते थे, ऋषि समाज का मार्गदर्शन करते थे और सामान्य लोग अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करते थे। त्रेतायुग का सबसे बड़ा संदेश यह है कि धर्म केवल मंदिरों या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक कार्य में सत्य, न्याय, करुणा, सेवा और मर्यादा का पालन करना ही वास्तविक धर्म है। भगवान श्रीराम का जीवन और विष्णु पुराण की शिक्षाएं आज भी यही प्रेरणा देती हैं कि समाज तभी सुखी और समृद्ध बन सकता है, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को धर्म मानकर उसका पालन करे।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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