Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का स्वरूप साहस, शक्ति और शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है। देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो घंटे के आकार का दिखाई देता है। इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मां का यह स्वरूप भक्तों को निर्भयता प्रदान करने और दुष्ट शक्तियों का नाश करने का प्रतीक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां पार्वती ने चंद्रघंटा का स्वरूप क्यों धारण किया और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा प्रचलित है? आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा के अवतार की कथा...
मां पार्वती और भगवान शिव के विवाह की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की तैयारियां शुरू हुईं। विवाह के समय भगवान शिव अपने गणों, भूत-प्रेतों और विचित्र रूप धारण करने वाले अनुचरों के साथ बारात लेकर पहुंचे। भगवान शिव का यह रूप देखकर माता पार्वती के परिवार के लोग भयभीत हो गए।
कथा के अनुसार, भगवान शिव की बारात में शामिल गणों का रूप अत्यंत विचित्र था। कोई भस्म लगाए हुए था तो कोई भयानक वेशभूषा में था। भगवान शिव स्वयं भी शरीर पर भस्म लगाए, गले में सर्प धारण किए और जटाओं में चंद्रमा सजाए हुए थे। उनका यह रूप देखकर विवाह में उपस्थित कई लोग घबरा गए। तब माता पार्वती ने परिस्थिति को संभालने और विवाह को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए दिव्य एवं सौम्य स्वरूप धारण किया। मां पार्वती के इसी दिव्य स्वरूप को मां चंद्रघंटा से जोड़कर भी बताया जाता है।
मां चंद्रघंटा के मस्तक पर कैसे आया घंटे के आकार का चंद्रमा?
नवदुर्गा की प्रचलित मान्यता के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव से विवाह के बाद चंद्रघंटा स्वरूप धारण किया। इस स्वरूप में उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी विशेषता के कारण देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा। मां के इस स्वरूप में दिव्यता के साथ शौर्य और पराक्रम का भी दर्शन होता है।
मां चंद्रघंटा को दस भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनके हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष-बाण और अन्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित होते हैं। उनका वाहन सिंह है। देवी का यह रूप बताता है कि वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा शांति का प्रतीक है, जबकि उनके हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र अधर्म और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की शक्ति को दर्शाते हैं।
जब दुष्ट शक्तियों के संहार के लिए प्रकट हुआ देवी का वीर स्वरूप
मां चंद्रघंटा की कथा में देवी के युद्ध करने वाले स्वरूप का विशेष महत्व है। नवदुर्गा की प्रचलित कथाओं में उन्हें ऐसी देवी माना गया है, जो धर्म की रक्षा और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए युद्ध करती हैं। उनके स्वरूप में एक ओर मातृत्व और करुणा है, तो दूसरी ओर अन्याय का सामना करने वाला अदम्य साहस है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ने अपने दिव्य स्वरूप और अस्त्र-शस्त्रों के माध्यम से यह संदेश दिया कि जब भी संसार में अधर्म बढ़ता है और निर्दोषों पर संकट आता है, तब दैवी शक्ति उसकी रक्षा के लिए प्रकट होती है। मां चंद्रघंटा का सिंह पर सवार होना उनकी निर्भीकता और पराक्रम को दर्शाता है। उनके घंटे की ध्वनि को भी दुष्ट शक्तियों के लिए भय उत्पन्न करने वाला और नकारात्मकता को दूर करने वाला माना जाता है।
हालांकि, मां चंद्रघंटा के अवतार से जुड़ी कथाओं के अलग-अलग प्रचलित रूप मिलते हैं। भगवान शिव के विवाह के समय माता पार्वती द्वारा दिव्य स्वरूप धारण करने की कथा और देवी द्वारा दानवों से युद्ध करने की मान्यताओं को कई धार्मिक वर्णनों में अलग-अलग प्रसंगों के रूप में बताया जाता है। इसलिए इन्हें एक ही घटनाक्रम की निश्चित पौराणिक कथा मानने के बजाय देवी के स्वरूप से जुड़ी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के रूप में समझना उचित है।
मां चंद्रघंटा की पूजा का क्या है धार्मिक महत्व?
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त देवी की आराधना करके साहस, आत्मविश्वास, शांति और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मान्यता है कि मां की उपासना से भय दूर होता है और व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह भी सिखाता है कि जीवन में शांति और साहस दोनों का संतुलन आवश्यक है। जिस प्रकार देवी का मस्तक चंद्रमा से सुशोभित है और उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी विवेक के साथ अन्याय का सामना करना चाहिए। नवरात्रि में मां के इस स्वरूप की पूजा भक्तों को बुराइयों से दूर रहने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।