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Samudra Manthan Ki Pauranik Katha : आखिर क्यों किया गया था समुद्र मंथन, जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Samudra Manthan Ki Pauranik Katha : समुद्र मंथन की कथा पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में मिलती है। समुद्र मंथन हिंदू धर्म की सबसे रोचक और रहस्यमयी कथाओं में से एक है।

Samudra Manthan
Samudra Manthan Ki Pauranik Katha : समुद्र मंथन की कथा पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में मिलती है। समुद्र मंथन हिंदू धर्म की सबसे रोचक और रहस्यमयी कथाओं में से एक है। यह सिर्फ एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश छिपे हैं, जो आज भी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ था, उस दौरान भगवान दैत्यों से अमृत कलश ले रहे थे, तब अमृत की कुछ बूंदें भारत के चार पवित्र स्थानों पर गिरी थीं। आइए जानते हैं इन 4 स्थानों के बारे में।

हरिद्वार, उत्तराखंड

मान्यता है कि जब भगवान अमृत कलश लेकर भाग रहे थे, तो इस छीना-झपटी में अमृत की कुछ बूंदें हरिद्वार में गिर गईं। यहां हर 12 साल में कुंभ मेला लगता है, जिसमें लाखों लोग गंगा में स्नान करने आते हैं, उनका मानना है कि इससे उन्हें आध्यात्मिक शुद्धि और मोक्ष मिलेगा।

उज्जैन, मध्य प्रदेश

मान्यता है कि यहां शिप्रा नदी के तट पर अमृत की एक बूंद गिरी थी। यही वजह है कि उज्जैन की गिनती भी भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में होती है। हर 12 साल में यहां सिंहस्थ कुंभ मेले का आयोजन होता है, जिसमें साधु-संतों समेत लाखों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

मान्यताओं के अनुसार, जब देवता राक्षसों से अमृत की रक्षा कर रहे थे, तो अमृत कलश से कुछ बूंदें गिरीं, जिसके कारण यह स्थान तीर्थ बन गया।

नासिक, महाराष्ट्र

मान्यता है कि अमृत की एक बूंद नासिक में भी गिरी थी, खासकर गोदावरी नदी के पास। नासिक में हर 12 साल में कुंभ मेले का भी आयोजन होता है। इसके साथ ही जो लोग पवित्र स्नान करते हैं। वे मोक्ष की कामना भी करते हैं।

समुद्र मंथन (समुद्र मंथन) की शुरुआत कैसे हुई?

एक बार भगवान इंद्र अपने हाथी ऐरावत के साथ घूम रहे थे। रास्ते में उनकी मुलाकात ऋषि दुर्वासा से हुई जिन्होंने उन्हें एक चमत्कारी माला दी। इंद्र ने उस माला को अपने हाथी की सूंड पर रखा, लेकिन हाथी ने उसे अपने पैरों से कुचल दिया। इससे ऋषि दुर्वासा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र और सभी देवताओं को श्राप दिया कि वे अपनी शक्ति, शक्ति और सम्मान खो देंगे।

कमजोर हो चुके देवता राक्षसों से हारने लगे और डर के मारे उन्होंने भगवान विष्णु से मदद मांगी। विष्णु ने उन्हें बताया कि अगर वे क्षीर सागर का मंथन करेंगे तो अमृत निकलेगा, जिससे वे अमर हो जाएंगे। लेकिन समुद्र मंथन आसान नहीं था और देवता अब शक्तिहीन हो चुके थे। इसीलिए इंद्र ने राक्षसों से मदद मांगी और उन्हें अमृत में हिस्सा देने का वादा किया। लालच के कारण राक्षस मान गए।

समुद्र मंथन की प्रक्रिया

मंदराचल पर्वत को मथनी (रस्सी घुमाने की छड़) बनाया गया और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। जब मंदराचल को समुद्र में रखा गया तो वह डूबने लगा। तब विष्णु ने कूर्म अवतार (कछुए) का रूप धारण किया और पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया। वासुकी को पर्वत के चारों ओर लपेटा गया और देवता और राक्षस उसके दोनों सिरों को पकड़कर खींचने लगे।

अमृत मिलने के बाद लड़ाई शुरू हुई

कई वर्षों तक मंथन के बाद धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत निकलते ही देवताओं और दानवों में लड़ाई शुरू हो गई। एक असुर अमृत कलश लेकर भाग गया। भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। उन्होंने एक सुंदर स्त्री बनकर असुरों का ध्यान भटकाया और देवताओं को अमृत पिला दिया।

लेकिन एक असुर "स्वरभानु" ने छल से अमृत पी लिया। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और विष्णु ने उसके दो टुकड़े कर दिए। उसका सिर "राहु" और धड़ "केतु" बन गया। इस तरह सभी देवताओं ने अमृत पीकर अपनी-अपनी शक्तियां वापस प्राप्त कर लीं।

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