Maa Skandamata: नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप ममता, प्रेम, करुणा और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर विशेष कृपा करती हैं और संतान से जुड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उनकी आराधना की जाती है। यही वजह है कि संतान सुख की कामना करने वाले दंपती भी मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करते हैं। मां की गोद में विराजमान भगवान स्कंद का स्वरूप मातृत्व और वात्सल्य का संदेश देता है। क्या आपने कभी सोचा है कि मां दुर्गा के इस स्वरूप को संतान सुख की देवी क्यों माना जाता है और उनकी पूजा का क्या धार्मिक महत्व है? आइए जानते हैं।
कौन हैं मां स्कंदमाता?
मां स्कंदमाता मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में पांचवां स्वरूप हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है। स्कंद की माता होने के कारण देवी पार्वती के इस स्वरूप का नाम स्कंदमाता पड़ा। मां स्कंदमाता की गोद में भगवान स्कंद बाल रूप में विराजमान रहते हैं। उनकी यह छवि मां और संतान के बीच प्रेम, सुरक्षा और अटूट संबंध को दर्शाती है। देवी का यह स्वरूप भक्तों को ममता और करुणा का अनुभव कराता है। इसी कारण नवरात्रि में मां स्कंदमाता की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है।
संतान सुख की देवी क्यों कहलाती हैं?
धार्मिक मान्यताओं में मां स्कंदमाता को संतान की रक्षा करने वाली और मातृत्व का आशीर्वाद देने वाली देवी माना जाता है। उनकी गोद में विराजमान भगवान स्कंद इस स्वरूप को संतान और मां के संबंध से जोड़ते हैं। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से मां की आराधना करते हैं, उन्हें देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। संतान सुख की कामना करने वाले दंपती मां के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं और परिवार में सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, यह धार्मिक आस्था का विषय है। संतान प्राप्ति से जुड़ी समस्याओं के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना भी जरूरी है।
मां की गोद में बाल रूप में क्यों हैं भगवान स्कंद?
मां स्कंदमाता की प्रतिमा में भगवान स्कंद को बाल रूप में उनकी गोद में बैठे हुए दिखाया जाता है। यह दृश्य मां के स्नेह, संरक्षण और त्याग को दर्शाता है। एक मां जिस तरह अपनी संतान की देखभाल करती है और उसे हर संकट से बचाने की कामना करती है, उसी भावना का प्रतीक देवी का यह स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से मां स्कंदमाता की गोद में विराजमान भगवान स्कंद यह संदेश देते हैं कि मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि संतान के पालन-पोषण, संस्कार और सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसी वजह से देवी को संतान की मंगलकामना करने वाली माता के रूप में पूजा जाता है।
कैसी है मां स्कंदमाता की प्रतिमा?
मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी माना जाता है। उनकी चार भुजाएं बताई जाती हैं। दो हाथों में कमल के फूल सुशोभित रहते हैं, जबकि एक हाथ से वे भगवान स्कंद को संभालती हैं और दूसरे हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। देवी कमल के आसन पर विराजमान दिखाई देती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनका वाहन सिंह है। मां के इस स्वरूप में शक्ति और ममता का सुंदर मेल दिखाई देता है। सिंह उनकी शक्ति का प्रतीक है, जबकि गोद में बैठे भगवान स्कंद उनके मातृत्व और वात्सल्य को दर्शाते हैं।
संतान की मंगलकामना के लिए कैसे करें आराधना?
नवरात्रि के पांचवें दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल पर मां स्कंदमाता की प्रतिमा स्थापित करें या उनके चित्र के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद देवी को फूल अर्पित करें, धूप-दीप दिखाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार फल या मिठाई का भोग लगाएं। मां के मंत्र का जाप करके संतान के सुख, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करें। पूजा के दौरान मन में श्रद्धा और सकारात्मक भाव रखें। धार्मिक परंपराओं में मां स्कंदमाता की आराधना को परिवार के कल्याण और संतान की मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।
मां स्कंदमाता का मंत्र
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस मंत्र का जाप करके मां से सुख-समृद्धि, पारिवारिक शांति और संतान के कल्याण की प्रार्थना कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर ममता बरसाती हैं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती हैं।
मां स्कंदमाता की पूजा का धार्मिक महत्व