Maa Skandamata: शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। माता के इस स्वरूप में भगवान कार्तिकेय उनकी गोद में विराजमान रहते हैं। मां स्कंदमाता को संतान सुख, ममता और करुणा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक चित्रों में उनका एक विशेष रूप दिखाई देता है, जिसमें वे कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां स्कंदमाता का कमल के आसन पर विराजमान होना इतना खास क्यों माना जाता है? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और मां के इस स्वरूप से कौन-सा संदेश मिलता है? आइए जानते हैं मां स्कंदमाता को पद्मासना देवी कहे जाने की वजह और इससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं...
मां स्कंदमाता को क्यों कहते हैं पद्मासना देवी?
मां स्कंदमाता के नाम में ही उनके स्वरूप का विशेष अर्थ छिपा है। स्कंद भगवान कार्तिकेय का एक नाम है और माता होने के कारण उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। वहीं, पद्म का अर्थ कमल और आसन का अर्थ बैठने का स्थान होता है। इस तरह पद्मासना का अर्थ है कमल के आसन पर विराजमान होने वाली देवी। धार्मिक मान्यताओं और देवी के प्रचलित स्वरूपों में मां स्कंदमाता को कमल पर बैठा हुआ दिखाया जाता है। इसी विशेषता के कारण उन्हें पद्मासना देवी के नाम से भी जाना जाता है।
मां के स्वरूप में कमल का महत्व
हिंदू धर्म में कमल को पवित्रता, सुंदरता, शांति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। कमल की एक खास बात यह है कि वह कीचड़ में खिलने के बावजूद अपनी सुंदरता और स्वच्छता बनाए रखता है। इसी वजह से धार्मिक परंपराओं में कमल को संसार में रहते हुए भी अपने विचारों और आचरण को पवित्र बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है। मां स्कंदमाता का कमल के आसन पर विराजमान होना भी इसी भाव से जोड़ा जाता है। उनके इस स्वरूप के माध्यम से भक्तों को शांति, पवित्रता और सकारात्मक विचारों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।
मां स्कंदमाता की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय का जन्म देवताओं को तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव का पुत्र ही कर सकता है। इस वरदान के कारण वह स्वयं को अजेय समझने लगा था और देवताओं को परेशान करता था। तब देवताओं ने भगवान शिव और माता पार्वती से तारकासुर के अंत का मार्ग निकालने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ और उन्होंने बड़े होकर तारकासुर का वध किया। भगवान कार्तिकेय की माता होने के कारण पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा गया।
धार्मिक परंपरा में मां स्कंदमाता को अपने पुत्र के साथ दर्शाया जाता है। उनकी गोद में विराजमान भगवान कार्तिकेय उनके मातृस्वरूप और वात्सल्य को प्रकट करते हैं। वहीं, कमल पर विराजमान मां का स्वरूप उनकी दिव्यता और पवित्रता को दर्शाता है। हालांकि, पद्मासना नाम से जुड़ी मान्यता मुख्य रूप से उनके कमल के आसन पर विराजमान होने के स्वरूप पर आधारित है। इसे किसी एक विशिष्ट पौराणिक घटना से जोड़ने के बजाय देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप के रूप में समझा जाता है।
मां स्कंदमाता के चार हाथों का महत्व
मां स्कंदमाता की प्रतिमा में उनके चार हाथ दिखाई देते हैं। माता के दो हाथों में कमल के फूल होते हैं, जबकि एक हाथ से वे भगवान कार्तिकेय को गोद में संभालती हैं। उनका एक हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में रहता है। कमल के फूल उनके पवित्र और दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं, जबकि आशीर्वाद देने वाली मुद्रा भक्तों के प्रति उनकी कृपा और करुणा का प्रतीक मानी जाती है। इस स्वरूप में मां अपने पुत्र के साथ विराजमान होकर ममता और शक्ति, दोनों का संदेश देती हैं।
नवरात्रि के पांचवें दिन पूजा का महत्व