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Hindu Culture: नाम जप और मंत्र जप में क्या है अंतर, जानिए जाप करने का नियम और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Supriya Sharma
सार

Naam Jap vs Mantra Jap: शास्त्र अनुसार 'ज' का अर्थ जन्म का रुक जाना और 'प' का अर्थ पाप का नष्ट हो जाना। किसी शब्द या मंत्र को बार-बार उच्चारित करना या मन ही मन दोहराना जपयोग कहलाता है। 

Hindu Culture
Naam Jap And Mantra Jap Difference: शास्त्र अनुसार 'ज' का अर्थ जन्म का रुक जाना और 'प' का अर्थ पाप का नष्ट हो जाना। किसी शब्द या मंत्र को बार-बार उच्चारित करना या मन ही मन दोहराना जपयोग कहलाता है। इसे मंत्रयोग भी कहते हैं। जपयोग सबसे प्राचीनतम योग है। यह एक चमत्कारिक योग है। इसका असर व्यक्ति के मन और मस्तिष्क पर जबरदस्त पड़ता है। जपयोग हर तरह के रोग और शोक को मिटाने की क्षमता रखता है। सनातन धर्म में 'नाम जप' और 'मंत्र जप' दोनों को ही आत्मा या ईश्वर से जुड़ने का अत्यंत प्रभावशाली माध्यम बताया गया है। ऊपर से ये दोनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनके पीछे का विज्ञान, नियम और प्रभाव काफी अलग हैं। आइए इनके अंतर को गहराई से समझते हैं कि आपके लिए क्या जपना सही रहेगा।

1. नाम जप क्या है?

नाम जप: ईश्वर के किसी भी कल्याणकारी स्वरूप के नाम को बार-बार दोहराना 'नाम जप' कहलाता है। जैसे- राम, कृष्ण, शिव, हरि, नारायण, या सीताराम।
नियम: नाम जप के लिए कोई नियम, समय, आसन, दिशा या शुद्धि का बंधन नहीं होता। आप उठते-बैठते, खाते-पीते, यात्रा करते हुए या अशुद्ध अवस्था में भी मन ही मन नाम जप कर सकते हैं।
भाव: इसमें केवल प्रेम और श्रद्धा की आवश्यकता होती है। यह सीधे भगवान से नाता जोड़ता है।
प्रभाव: यह मन को शांत करता है, अहंकार को मिटाता है और अंतःकरण (आत्मा) को शुद्ध करता है। आत्मा या प्रभु दर्शन कराता है। 

2. मंत्र जप क्या है?

मंत्र जप: मंत्र का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बाiधना। मंत्र अक्षरों या शब्दों का एक ऐसा विशेष समूह होता है, जिसमें गुप्त शक्तियां और तीव्र तरंगें छिपी होती हैं। अधिकांश मंत्रों की शुरुआत 'ॐ' या बीजाक्षरों (जैसे ह्रीं, क्लीं, श्रीं) से होती है। जैसे- ॐ नमः शिवाय, गायत्री मंत्र, या महामृत्युंजय मंत्र।
नियम: मंत्र जप के नियम बहुत कड़े होते हैं। इसके लिए निश्चित समय, विशेष आसन, माला (जैसे रुद्राक्ष या तुलसी), सही उच्चारण और शारीरिक व मानसिक पवित्रता अनिवार्य है। गलत उच्चारण या गलत विधि से इसके विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं।
दीक्षा: उच्च कोटि के या तांत्रिक मंत्रों के लिए गुरु से दीक्षा लेना आवश्यक माना जाता है।
प्रभाव: मंत्र एक ऊर्जा की तरह काम करता है। यह आपके भीतर और आस-पास के वातावरण में एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (Energy Field) बनाता है, जिससे मानसिक शक्ति, एकाग्रता और विशिष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

नाम जप: 

कोई नियम नहीं, कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं। 

इसमें संख्याओं का कोई महत्व नहीं, निरंतरता जरूरी।
इसके लिए गुरु दीक्षा की कोई अनिवार्यता नहीं है। 
इसमें 'भाव' और 'प्रेम' प्रधान होता है।
यह पूरी तरह सुरक्षित है, कभी कोई नुकसान नहीं होता।
नाम जप के द्वारा मन-मस्तिष्क को बुरे विचारों से दूर रखकर उसे नए और अच्छे विचारों में बदल सकते हैं। 

मंत्र जप:

कड़े नियम, निश्चित समय, आसन और शुद्धि जरूरी। 

मंत्र में जप संख्याओं का महत्व भी माना गया है।
विशेष और बीजाक्षर मंत्रों के लिए गुरु अनिवार्य हैं। 
इसमें 'ध्वनि' और 'उच्चारण' प्रधान होता है। 
गलत विधि या अशुद्ध उच्चारण से नुकसान संभव है।
मंत्र से किसी देवी, देवता, भूत पिशाच, यक्षिणी और यक्ष को भी साधा जाता है। 
'मंत्र साधना' भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

मुख्यत: 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1.वैदिक मंत्र, 2.तांत्रिक मंत्र और 3.शाबर मंत्र। 

जप के भेद- 1.वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।
वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना। उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।

माला नियम: जप करते वक्त माला फेरी जाती है जिससे जप संख्या का पता चलता है। यह माला 108 मनकों की होती है। जिस माला से जाप करें, उसे दाहिने हाथ में रखना चाहिए। जप करते समय माला का भूमि पर स्पर्श नहीं होना चाहिए। 

आपको क्या जपना चाहिए?

सुगमता: कलयुग में शास्त्रों और संतों ने 'नाम जप' को सबसे सुगम और सर्वोत्तम बताया है। आपके लिए क्या सही है, इसे आप अपनी स्थिति के अनुसार चुन सकते हैं।
गृहस्थ: यदि आप गृहस्थ हैं और व्यस्त रहते हैं तो आपके लिए 'नाम जप' (जैसे 'राम-राम', ॐ हनुमते नम:, 'ॐ नमः शिवाय' या 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे') सबसे अच्छा है। इसे आप काम करते हुए भी कर सकते हैं। इसमें गलती होने पर भी पाप नहीं लगता, क्योंकि भगवान भक्त का भाव देखते हैं।
साधक: यदि आप नियम और अनुशासन का पालन कर सकते हैं और यदि आपके पास रोज एक निश्चित समय पर, साफ-सुथरे स्थान पर बैठकर ध्यान लगाने का समय है, तो आप मंत्र जप (जैसे गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र या नाम मंत्र) चुन सकते हैं।
प्रारंभ: यदि आप नए हैं तो शुरुआत हमेशा 'नाम जप' से करें। जब मन थोड़ा शांत और एकाग्र होने लगे, तब आप किसी सरल मंत्र की ओर बढ़ सकते हैं।
गुरु: यदि आपके पास कोई गुरु नहीं हैं, तो बिना किसी संशय के अपने इष्ट देव (शिव, कृष्ण, राम, हनुमान जी या दुर्गा मां) का केवल नाम जपना शुरू कर दीजिए। बप्पा और ईश्वर केवल भाव के भूखे हैं!

- शैली प्रकाश

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