Papankusha Ekadashi Date In 2025: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्ष भर में 24 एकादशी तिथियां आती हैं, प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है।
Papankusha Ekadashi Date In 2025: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्ष भर में 24 एकादशी तिथियां आती हैं, प्रत्येक का अपना अलग महत्व होता है। इनमें से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत पापों के नाश करने वाला माना जाता है।
'पापांकुशा' शब्द का अर्थ है 'पापों को नष्ट करने वाली'। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए, वर्ष 2025 में पापांकुशा एकादशी की तिथि, इसके महत्व और व्रत कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।
पापांकुशा एकादशी 2025 की तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह तिथि 2 अक्टूबर 2025 की शाम 7:10 बजे से प्रारंभ होकर 3 अक्टूबर 2025 की शाम 6:32 बजे तक रहेगी। व्रत मुख्य रूप से 3 अक्टूबर 2025 को रखा जाएगा, जो शुक्रवार का दिन होगा।
व्रत का पारण (उपवास समाप्ति) अगले दिन, यानी 4 अक्टूबर 2025 को प्रातः 5:34 बजे से 7:56 बजे तक किया जा सकता है। यह तिथि दशहरा (विजयादशमी) के ठीक अगले दिन आती है, जो शारदीय नवरात्रि के समापन के बाद होती है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा की जाती है।
व्रत रखने वाले भक्तों को दशमी तिथि (2 अक्टूबर) को सूर्यास्त से पहले एक सात्विक भोजन करना चाहिए। एकादशी पर पूर्ण उपवास रखा जाता है, जिसमें फलाहार या निर्जला व्रत का पालन किया जा सकता है। द्वादशी पर पारण समय के बीच में व्रत समाप्त किया जाता है।
पापांकुशा एकादशी का महत्व
पापांकुशा एकादशी का महत्व अत्यंत विशाल है। पद्म पुराण के अनुसार, इस व्रत को रखने से व्यक्ति को हजारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है। यह व्रत पापों को नष्ट करने के साथ-साथ धन, स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि प्रदान करता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाले भक्त को यम की यातनाओं से मुक्ति मिलती है और मृत्यु के बाद वह विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा इस दिन विशेष रूप से की जाती है। पद्मनाभ स्वरूप में भगवान क्षीर सागर पर शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, उनके नाभि से कमल उत्पन्न होता है, जिस पर ब्रह्मा जी विराजमान हैं। माता लक्ष्मी उनके चरणों के पास विराजमान रहती हैं। इस पूजा से भक्त को सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
इस व्रत का फल इतना महान है कि इससे व्रती के 10 मातृ पक्षीय, 10 पितृ पक्षीय और 10 पति/पत्नी पक्षीय पूर्वजों को भी मोक्ष प्राप्त होता है। वे सभी विष्णु रूप धारण करके वैकुंठ धाम पहुंच जाते हैं। जो व्यक्ति इस व्रत को नियमों के साथ रखता है, वह जीवन में कभी दरिद्रता या रोगों से ग्रस्त नहीं होता। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो पापों से मुक्ति चाहते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत बिना किए व्यक्ति को पापों का पीछा जीवन भर लगा रहता है। लेकिन इस व्रत से सभी बुरे कर्मों का नाश हो जाता है। वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी इस दिन को अत्यंत पवित्र मानते हैं। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है, बल्कि सांसारिक सुखों को भी आकर्षित करता है। इस दिन तुलसी को जल न देने की मनाही है, क्योंकि यह देवउठनी एकादशी से पहले का समय होता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
एक बार पांडवों के ज्येष्ठ भाई धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा, "मधुसूदन! हे केशव! हे जनार्दन! कृपया बताएं कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है? इसकी पूजा और व्रत की विधि क्या है?" भगवान कृष्ण मुस्कुराए और बोले, "हे राजन! सुनो, यह एकादशी पापों का नाश करने वाली है। इसे पापांकुशा एकादशी कहते हैं। इसकी कथा सुनो।
प्राचीन काल में एक नगर में एक वैश्य रहता था, जिसका नाम भल्लाट था। वह अत्यंत धार्मिक और दानशील था। वह प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा करता था। एक दिन उसे एक स्वप्न आया, जिसमें एक ब्राह्मण ने कहा कि उसके पूर्वज नर्क में यातनाएं भुगत रहे हैं क्योंकि उन्होंने पाप किए थे।
भल्लाट ने सोचा कि वह अपने पूर्वजों को कैसे मुक्त करे। अगले दिन वह ब्राह्मणों से पूछताछ करने लगा। एक विद्वान ब्राह्मण ने बताया कि पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने से पूर्वजों को मुक्ति मिलती है। भल्लाट ने व्रत रखा। व्रत के दौरान वह भगवान पद्मनाभ की पूजा करता रहा। व्रत के प्रभाव से उसके पूर्वजों को नर्क से मुक्ति मिली और वे स्वर्ग लोक चले गए।
भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को कहा, जो व्यक्ति इस व्रत को रखता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह व्रत सूर्य यज्ञ के समान फल देता है। व्रती को चार भुजाओं वाला, गरुड़ ध्वज, पितांबर वस्त्र धारण करने वाला दिव्य रूप प्राप्त होता है। उसके पूर्वज भी विष्णु लोक पहुंचते हैं।' कथा सुनने के बाद युधिष्ठिर ने कहा, 'हे गोविंद! यह कथा अत्यंत पवित्र है। मैं इसे सभी को सुनाऊंगा।' इस प्रकार, पापांकुशा एकादशी की कथा समस्त पापों का नाश करती है।