Maa Brahmacharini: शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में उनका दूसरा स्वरूप तप, त्याग, संयम और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां ब्रह्मचारिणी का जन्म कैसे हुआ और उन्हें यह नाम क्यों मिला? उनकी तपस्या के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी के जन्म और उनकी तपस्या की पूरी कथा...
मां ब्रह्मचारिणी का जन्म
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का संबंध माता पार्वती के स्वरूप से है। उन्हें पर्वतराज हिमालय और माता मैना की पुत्री माना जाता है। पूर्व जन्म में माता पार्वती सती के रूप में भगवान शिव की पत्नी थीं। राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद उन्होंने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती कहलाईं। माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव के प्रति विशेष श्रद्धा रखती थीं। उनके मन में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा थी। जब उन्हें पता चला कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या करनी होगी, तो उन्होंने इसके लिए स्वयं को तैयार कर लिया।
नारद मुनि ने बताया तपस्या का मार्ग
धार्मिक कथा के अनुसार, एक दिन देवर्षि नारद माता पार्वती के पास पहुंचे। उन्होंने माता के भविष्य और उनके विवाह से जुड़ी परिस्थितियों के बारे में बताया। नारद मुनि ने उन्हें भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करने की सलाह दी। माता पार्वती ने उनकी बात स्वीकार कर ली और भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं।
इसके बाद उन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ तपस्या करने लगीं। उनकी साधना इतनी कठिन थी कि उन्होंने लंबे समय तक फल, फूल और पत्तों का सेवन करके जीवन बिताया। बाद में उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया और बिना भोजन के तपस्या जारी रखी।
कठिन तपस्या से मिला ब्रह्मचारिणी नाम
मां पार्वती की कठोर तपस्या के कारण ही उनके इस स्वरूप को मां ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। ब्रह्मचारिणी शब्द का संबंध ब्रह्म के मार्ग पर चलने, तप का पालन करने और संयमित जीवन जीने से माना जाता है। माता ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए जिस धैर्य और दृढ़ निश्चय का परिचय दिया, वह उनके इस नाम की विशेषता को दर्शाता है। पौराणिक कथा में बताया जाता है कि माता पार्वती ने हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने पहले फल और फूल खाकर समय बिताया, फिर सूखे पत्तों का सेवन किया और अंत में भोजन-पानी का भी त्याग कर दिया। उनकी इसी कठोर साधना के कारण उन्हें अपर्णा नाम से भी जाना जाता है। अपर्णा का अर्थ उस देवी से जो पत्ते तक ग्रहण न करे।
देवताओं ने भी की तपस्या की प्रशंसा
माता पार्वती की कठोर साधना से तीनों लोकों में उनकी तपस्या की चर्चा होने लगी। देवताओं और ऋषि-मुनियों ने उनके धैर्य, त्याग और संकल्प की प्रशंसा की। इतनी कठिन परिस्थितियों में भी माता पार्वती अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुईं। उन्होंने हर चुनौती का सामना करते हुए भगवान शिव की आराधना जारी रखी। कथा के अनुसार, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इस प्रकार माता पार्वती की साधना सफल हुई और उनका भगवान शिव से विवाह हुआ। मां ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप भक्तों को सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा और दृढ़ संकल्प के साथ कठिन से कठिन लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सकता है।
मां ब्रह्मचारिणी के स्वरूप की विशेषता
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत और तेजस्वी माना जाता है। उनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल रहता है। जप की माला साधना, भक्ति और एकाग्रता का प्रतीक है, जबकि कमंडल त्याग, सादगी और तपस्वी जीवन को दर्शाता है। मां का यह स्वरूप भक्तों को संयम और आत्मबल का संदेश देता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन क्यों होती है पूजा?