Bhadrapada Bhaum Pradosh Vrat: भाद्रपद मास में भगवान शिव की उपासना के लिए आने वाला प्रदोष व्रत इस बार खास संयोग लेकर आ रहा है। प्रदोष व्रत जब मंगलवार के दिन पड़ता है तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। मंगलवार का दिन भगवान शिव के साथ मंगल ग्रह से भी जुड़ा माना जाता है, इसलिए इस दिन किए जाने वाले शिव पूजन का धार्मिक महत्व विशेष बताया गया है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष का भौम प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा? पूजा के लिए कौन सा समय शुभ रहेगा और भगवान शिव की पूजा किस विधि से करनी चाहिए? क्या आपको पता है कि प्रदोष काल में शिव पूजा करने की परंपरा क्यों है? आइए जानते हैं इस व्रत से जुड़ी जरूरी जानकारी...
कब है भाद्रपद का भौम प्रदोष
पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर 2026, मंगलवार को है। इसी दिन भौम प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि दोपहर 2 बजकर 42 मिनट से शुरू होगी और 9 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में होने के कारण व्रत और शिव पूजा 8 सितंबर को ही की जाएगी।
भौम प्रदोष का शुभ मुहूर्त
प्रदोष व्रत में सूर्यास्त के बाद आने वाले प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने की परंपरा है। दिल्ली के पंचांग के अनुसार 8 सितंबर को भौम प्रदोष की पूजा का समय शाम 6 बजकर 35 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त के समय में अंतर होने के कारण प्रदोष पूजा का समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार प्रदोष काल का समय देखना उचित माना जाता है। पूजा के लिए प्रदोष काल को ही विशेष महत्व दिया जाता है।
भौम प्रदोष क्यों है खास
सोमवार को पड़ने वाले प्रदोष को सोम प्रदोष और शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष को शनि प्रदोष कहा जाता है। इसी तरह मंगलवार के दिन आने वाला प्रदोष भौम प्रदोष कहलाता है। भौम शब्द मंगल ग्रह के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण इस व्रत में भगवान शिव के साथ मंगल देव से जुड़ी मान्यताओं का भी संबंध माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं और प्रदोष काल में शिवलिंग का पूजन करते हैं।
सुबह ऐसे करें दिन की शुरुआत
भौम प्रदोष के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद भगवान शिव के सामने दीपक जलाएं। व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन भगवान शिव का स्मरण कर सकते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या निर्जल व्रत रखा जा सकता है। हालांकि व्रत का स्वरूप व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखा जाता है।
प्रदोष काल में करें शिव पूजा
भौम प्रदोष की पूजा शाम के समय प्रदोष काल में करना विशेष माना जाता है। पूजा के लिए सबसे पहले भगवान शिव का ध्यान करें और शिवलिंग को स्वच्छ जल से स्नान कराएं। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल आदि से अभिषेक किया जा सकता है। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर चंदन लगाएं और बेलपत्र, अक्षत, फूल तथा धतूरा आदि अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाते समय श्रद्धा का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके बाद धूप और दीप जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें।
शिव मंत्र का करें जाप
पूजा के दौरान भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना भी शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसके अलावा शिव चालीसा या भगवान शिव से जुड़े स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है। इसके बाद भगवान शिव की आरती करें और अपनी मनोकामना भगवान शिव के सामने रखें। धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष काल में की गई शिव आराधना भगवान शिव को प्रसन्न करने वाली मानी जाती है।
व्रत का पारण कब करें
भौम प्रदोष व्रत रखने वाले श्रद्धालु अगले दिन व्रत का पारण करते हैं। व्रत की परंपरा अलग-अलग परिवारों और संप्रदायों में अलग हो सकती है, इसलिए पारण का समय अपने स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार रखना उचित माना जाता है। भाद्रपद का यह भौम प्रदोष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ रही है और प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा का अवसर मिल रहा है। 8 सितंबर 2026 को पड़ने वाले इस व्रत में श्रद्धालु शाम के प्रदोष काल में विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन कर सकते हैं।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)