Ahoi Ashtami: अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से अहोई माता की पूजा करती हैं। व्रत के दौरान घर की दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाने की परंपरा भी निभाई जाती है। कई घरों में महिलाएं गेरू से माता की आकृति बनाती हैं, तो कुछ जगहों पर उनके चित्र के साथ स्याहू और उसके बच्चों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। आखिर अहोई अष्टमी पर दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाने की परंपरा कैसे शुरू हुई और इसका क्या धार्मिक महत्व है? आइए जानते हैं।
अहोई माता का चित्र बनाने की परंपरा
अहोई अष्टमी पर दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाना पूजा की पुरानी परंपराओं में शामिल है। पहले के समय में महिलाएं घर की दीवार पर गेरू या दूसरे प्राकृतिक रंगों से माता की आकृति बनाती थीं। इसके बाद शाम के समय उसी चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती थी और अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनी जाती थी। समय के साथ पूजा की इस परंपरा में बदलाव आया है। अब कई महिलाएं दीवार पर चित्र बनाने के बजाय अहोई माता का कैलेंडर या छपी हुई तस्वीर भी लगाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चित्र के सामने श्रद्धापूर्वक पूजा करने से संतान के सुख और कल्याण के लिए माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
चित्र में स्याहू और उसके बच्चों का महत्व
अहोई माता के चित्र में उनके साथ स्याहू और उसके बच्चों की आकृतियां बनाने की परंपरा भी प्रचलित है। स्याहू को कई जगह साही या सेई भी कहा जाता है। अहोई अष्टमी की प्रचलित व्रत कथा में इसी जीव और उसके बच्चों का विशेष उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, एक महिला से अनजाने में स्याहू के बच्चे को नुकसान पहुंच जाता है। इसके बाद उसे अपने बच्चों से जुड़ा दुख सहना पड़ता है। अपनी गलती का एहसास होने पर वह पश्चाताप करती है और अहोई माता की आराधना करती है। उसकी श्रद्धा और प्रार्थना से उसके जीवन में फिर सुख लौटता है। इसी कथा की स्मृति में अहोई माता के चित्र के साथ स्याहू और उसके बच्चों को भी दर्शाया जाता है।
आठ कोष्ठकों वाली आकृति का महत्व
अहोई अष्टमी पर बनाए जाने वाले चित्र में कई जगह आठ कोष्ठकों या खानों वाली आकृति भी बनाई जाती है। इसका संबंध अष्टमी तिथि से जोड़ा जाता है। हिंदू पंचांग में चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को अष्टमी कहा जाता है और इसी तिथि पर अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इसलिए पूजा के चित्र में आठ भागों वाली आकृति बनाने की परंपरा देखने को मिलती है। हालांकि, चित्र बनाने का तरीका अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में कुछ भिन्न हो सकता है। कहीं माता की आकृति के साथ उनके बच्चों को दिखाया जाता है, तो कहीं व्रत कथा से जुड़े अन्य पात्रों को भी चित्र में स्थान दिया जाता है।
संतान की सुख-समृद्धि की कामना
अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से संतान के कल्याण के लिए रखा जाता है। माताएं इस दिन व्रत रखकर अहोई माता से अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। जिन महिलाओं को संतान की कामना होती है, वे भी इस दिन श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करती हैं। दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाना इसी आस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चित्र के सामने परिवार की महिलाएं एकत्र होकर पूजा करती हैं और संतान के सुखी जीवन की कामना करती हैं। इस तरह यह परंपरा केवल पूजा की विधि तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार की खुशहाली और मातृत्व से जुड़ी भावनाओं को भी व्यक्त करती है।
चित्र के सामने कैसे होती है पूजा?