विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की कथा भगवान श्रीकृष्ण और राक्षस बाणासुर से जुड़ी एक रोचक और प्रेरणादायक कहानी है। यह कथा भगवान गणेश की महिमा और उनके भक्तों के प्रति प्रेम को दर्शाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में द्वापर युग में बाणासुर नामक एक शक्तिशाली और पराक्रमी राक्षस राज करता था। उसकी पुत्री उषा अत्यंत सुंदर और गुणवान थी। एक रात उषा ने अपने स्वप्न में एक आकर्षक युवक को देखा, जिससे वह मन ही मन प्रेम करने लगी। उसकी सुंदरता और आकर्षण ने उषा के हृदय को बेचैन कर दिया। सुबह उठकर उसने अपनी सखी चित्रलेखा को अपने स्वप्न की बात बताई और कहा- मैंने जो युवक स्वप्न में देखा, वह मेरा जीवनसाथी बनेगा। तुम्हें उसे ढूंढकर मेरे पास लाना होगा, वरना मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।
चित्रलेखा एक मायावी राक्षसी थी और चित्रकला में निपुण थी। उसने उषा के वर्णन के आधार पर उस युवक का चित्र बनाया। चित्र देखकर उषा ने पुष्टि की कि यही वह युवक है जिसे उसने स्वप्न में देखा था। चित्रलेखा ने उस युवक को खोजने का संकल्प लिया और वह विभिन्न नगरों और राज्यों में भटकते हुए अंततः द्वारकापुरी पहुंची। वहां उसने उस युवक को पहचान लिया, जो कोई और नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध थे।
चित्रलेखा ने अपनी मायावी शक्तियों का उपयोग करते हुए रात के समय अनिरुद्ध का अपहरण कर लिया और उसे बाणासुर के महल में ले आई। अनिरुद्ध को उषा के सामने प्रस्तुत किया गया और उषा ने उसे देखकर अपने प्रेम को और दृढ़ कर लिया, लेकिन इस अपहरण की खबर जब द्वारकापुरी में फैली तो वहां हाहाकार मच गया। अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न और दादी रुक्मिणी इस वियोग में व्याकुल हो उठे। रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण से अनिरुद्ध को वापस लाने की गुहार लगाई और कहा- हे नाथ, हमारा प्रिय पौत्र कहां चला गया? यदि वह वापस नहीं आया, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।
श्रीकृष्ण भी इस घटना से अत्यंत दुखी थे। एक दिन जब वह अपनी सभा में विचार-विमर्श कर रहे थे, तभी वहां महान तपस्वी लोमश ऋषि का आगमन हुआ। श्रीकृष्ण ने उन्हें सारी बात बताई और अनिरुद्ध के अपहरण के बारे में पूछा। लोमश ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से सारा वृत्तांत जाना और श्रीकृष्ण को बताया- हे कृष्ण, तुम्हारे पौत्र अनिरुद्ध का अपहरण बाणासुर की पुत्री उषा की सखी चित्रलेखा ने किया है। वह उसे बाणासुर के महल में ले गई है। यदि तुम आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा से करोगे तो भगवान गणेश की कृपा से तुम्हारा पौत्र अवश्य वापस आ जाएगा।
लोमश ऋषि के निर्देशानुसार, श्रीकृष्ण ने पूरे विधि-विधान के साथ विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। उन्होंने भगवान गणेश की पूजा की, उपवास रखा और कथा का पाठ किया। गणेश जी की कृपा से श्रीकृष्ण को शक्ति प्राप्त हुई और वे बाणासुर के साथ युद्ध करने पहुंचे। इस युद्ध में श्रीकृष्ण की विजय हुई और बाणासुर ने अपनी हार स्वीकार कर ली। श्रीकृष्ण ने अनिरुद्ध को मुक्त करवाया और बाद में उनका विवाह उषा के साथ करवाया। इस प्रकार, विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के व्रत के प्रभाव से न केवल अनिरुद्ध की वापसी हुई, बल्कि दो परिवारों का मिलन भी संभव हुआ।
इस कथा से यह सिद्ध होता है कि भगवान गणेश की कृपा से कोई भी संकट असंभव नहीं है। जो भक्त सच्चे मन से इस व्रत को करता है, उसे सभी विघ्नों से मुक्ति मिलती है।
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