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Swami Chinmayanand Bapu: संसार में मृत्यु तो केवल एक घटना है, ऐसा क्यों कहते हैं स्वामी चिन्मयानंद बापू

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी चिन्मयानंद बापू
सार

Spiritual Thoughts: मृत्यु को एक घटना मानने की शिक्षा हमें जीवन को बेहतर ढंग से जीना सिखाती है। जब मनुष्य समझता है कि यह शरीर और संसार अस्थायी हैं, तो वह अहंकार, द्वेष और अनावश्यक चिंताओं से दूर होने लगता है। 
 

Swami Chinmayanand Bapu
Spiritual View of Death: संसार में मृत्यु को लेकर सामान्य मनुष्य के मन में भय रहता है। अधिकांश लोग मृत्यु को जीवन का अंत मान लेते हैं, इसलिए मृत्यु का विचार आते ही मन दुख, चिंता और डर से भर जाता है। लेकिन ज्ञानी महापुरुषों और संतों की दृष्टि इससे बिल्कुल अलग होती है। वे कहते हैं कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि केवल एक घटना है। जैसे जीवन में कई पड़ाव आते हैं और हम एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करने का माध्यम है।

स्वामी चिन्मयानंद बापू जैसे संत महापुरुष समझाते हैं कि आत्मा कभी नहीं मरती। मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर को छोड़कर अपनी यात्रा को आगे बढ़ाती है। इसलिए संत मृत्यु को भय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानते हैं।

संतों के लिए मृत्यु का भय 

वर्तमान समय में पूज्य प्रेमानंदी महाराज भी कहते हैं कि मैं तो अपनी अटैची तैयार करके बैठा हूं, पता नहीं कब राधारानी बुला लें और कब मुझे इस संसार से जाना पड़े। इस भाव के पीछे मृत्यु का डर नहीं, बल्कि भगवान के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण छिपा हुआ है। जो व्यक्ति ईश्वर के प्रेम में डूब जाता है, उसके लिए संसार से विदा होना दुख का कारण नहीं रहता, बल्कि प्रभु के मिलन का अवसर बन जाता है। ज्ञानी संत जानते हैं कि यह संसार एक यात्रा के समान है। यहां हर व्यक्ति कुछ समय के लिए आता है, अपने कर्मों को पूरा करता है और फिर आगे की यात्रा पर निकल जाता है। इसलिए संत मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि परम सत्य की ओर बढ़ने वाला एक नया कदम मानते हैं।

मृत्यु के बाद भी यात्रा रहती है जारी 

संतों के अनुसार हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। जब शरीर समाप्त होता है, तब आत्मा अपनी यात्रा को आगे बढ़ाती है। जैसे किसी चलचित्र में एक दृश्य समाप्त होता है और तुरंत दूसरा दृश्य शुरू हो जाता है, वैसे ही मृत्यु के बाद भी जीवन की एक नई अवस्था प्रारंभ होती है। जिस प्रकार पर्दे पर एक दृश्य बदलने से कहानी समाप्त नहीं होती, बल्कि आगे बढ़ती है, उसी प्रकार मृत्यु भी आत्मा की कहानी का अंत नहीं करती। यह केवल एक परिवर्तन है, एक नए अनुभव और नई यात्रा की शुरुआत है।

संतों की मृत्यु के प्रति आनंदमयी भावना

कबीरदास जी ने भी कहा है कि "मरने से सब जग डरा, मोरे मन आनंद, कब मरिहौं कब भेटिहौं, पूरन परमानंद।" इस वाणी में संतों की उस अवस्था का वर्णन है जहां मृत्यु भय का कारण नहीं रहती, बल्कि परमात्मा से मिलने का उत्सव बन जाती है। साधारण व्यक्ति संसार से जुड़ा होने के कारण मृत्यु से डरता है, लेकिन संत भगवान से जुड़े होते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि जब यह शरीर छूटेगा, तब वे अपने वास्तविक स्वरूप और परम आनंद के निकट पहुंचेंगे।

जीवन को सही समझने की प्रेरणा

मृत्यु को एक घटना मानने की शिक्षा हमें जीवन को बेहतर ढंग से जीना सिखाती है। जब मनुष्य समझता है कि यह शरीर और संसार अस्थायी हैं, तो वह अहंकार, द्वेष और अनावश्यक चिंताओं से दूर होने लगता है। वह प्रेम, सेवा, भक्ति और अच्छे कर्मों के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है। संतों का संदेश यही है कि मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपने जीवन को भगवान के स्मरण, अच्छे विचारों और सत्कर्मों से भरना चाहिए। मृत्यु केवल एक पड़ाव है, यात्रा का अंत नहीं। आत्मा की यह यात्रा अनंत है और परमात्मा की ओर बढ़ती रहती है।

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