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Swami Ashutoshanand Giri Ji: मन को संभालने का क्या है सही और आसान तरीका, स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Meditation Practice: मन को संभालने का सबसे सरल तरीका नियमित अभ्यास, श्वास पर ध्यान और मंत्र का स्मरण है। शुरुआत में कुछ मिनट का अभ्यास भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है। 
 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Mind Control in Life: मन स्वभाव से ही चंचल होता है। यह एक जगह टिकता नहीं है, कभी अतीत की बातों में चला जाता है तो कभी भविष्य की चिंता करने लगता है। इसी कारण व्यक्ति को शांति नहीं मिलती और उसका ध्यान किसी भी काम में पूरी तरह नहीं लग पाता। जब मन बिखरा हुआ होता है तो साधना, पढ़ाई या जीवन के निर्णय, सब प्रभावित होते हैं। इसलिए मन को एकाग्र करना बहुत जरूरी माना गया है।

स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी ने बताया कि शास्त्रों और योग परंपरा में बताया गया है कि मन और श्वास आपस में जुड़े होते हैं। जब श्वास तेज और अनियमित होती है तो मन भी अशांत रहता है, और जब श्वास धीमी और नियंत्रित होती है तो मन स्वतः शांत होने लगता है। इसी कारण प्राणायाम को मन को स्थिर करने का एक प्रभावी साधन माना गया है। साधारण अभ्यास से भी श्वास पर ध्यान देकर मन को नियंत्रित करना शुरू किया जा सकता है।

मंत्र और श्वास का अभ्यास

एक सरल तरीका यह बताया गया है कि श्वास के साथ मंत्र का स्मरण किया जाए। जब आप सांस लेते हैं तो मंत्र का एक भाग मन ही मन दोहराएं और जब सांस छोड़ते हैं तो दूसरा भाग। इस तरह ध्यान श्वास पर भी रहता है और मंत्र पर भी, जिससे मन भटकता नहीं है। शुरुआत में केवल कुछ मिनट का अभ्यास पर्याप्त होता है, जैसे ढाई से पांच मिनट। नियमित अभ्यास से धीरे-धीरे मन स्थिर होने लगता है और एकाग्रता बढ़ती है।

प्राणायाम और नाड़ी शुद्धि का महत्व

योग परंपरा में प्राणायाम को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें रेचक (सांस छोड़ना), पूरक (सांस लेना) और कुंभक (सांस रोकना) जैसी क्रियाएँ शामिल होती हैं। इनके अभ्यास से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और मन शांत होता है। साथ ही अनुलोम-विलोम और कपालभाति जैसे सरल अभ्यास भी मन को स्थिर करने में सहायक होते हैं। कहा जाता है कि इन अभ्यासों से शरीर की ऊर्जा नाड़ियों में संतुलन आता है और ध्यान की क्षमता बढ़ती है।

शरीर और ऊर्जा का आध्यात्मिक दृष्टिकोण

योग और तांत्रिक परंपरा में शरीर को केवल भौतिक नहीं बल्कि ऊर्जा से भरा हुआ माना गया है। इसमें अनेक नाड़ियाँ होती हैं जिनमें से कुछ प्रमुख मानी गई हैं। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना को मुख्य ऊर्जा मार्ग कहा गया है। साधना के माध्यम से जब इन ऊर्जा प्रवाहों का संतुलन होता है तो व्यक्ति की चेतना अधिक शांत और स्थिर हो जाती है। ध्यान की गहराई बढ़ने पर व्यक्ति अपने भीतर अधिक स्थिरता और स्पष्टता महसूस करता है।

गुरु और मार्गदर्शन का महत्व

आध्यात्मिक साधना में गुरु के मार्गदर्शन को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। कहा जाता है कि किसी भी गहरी साधना को बिना सही मार्गदर्शन के करना कठिन हो सकता है। गुरु व्यक्ति को सही दिशा, सही अभ्यास और अनुशासन सिखाते हैं जिससे साधना का सही लाभ मिल सके। इसलिए किसी अनुभवी मार्गदर्शक से सीखकर अभ्यास करना अधिक सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है।

ध्यान और समाधि की अवस्था

जब मन पूरी तरह स्थिर हो जाता है, तब ध्यान की अवस्था गहरी होती जाती है। धीरे-धीरे व्यक्ति बाहरी विचारों से ऊपर उठकर भीतर की शांति को अनुभव करने लगता है। इस अवस्था को ही योग में उच्च ध्यान या समाधि की ओर बढ़ने की प्रक्रिया कहा गया है, जहाँ मन और चेतना एक विशेष शांति और एकाग्रता में स्थित हो जाते हैं। मन को संभालने का सबसे सरल तरीका नियमित अभ्यास, श्वास पर ध्यान और मंत्र का स्मरण है। शुरुआत में कुछ मिनट का अभ्यास भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है। धीरे-धीरे यह अभ्यास व्यक्ति को मानसिक शांति, स्थिरता और गहरी एकाग्रता की ओर ले जाता है।

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