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Rajan Ji Maharaj: हमेशा आज में संतुष्ट रहने की करें कोशिश, राजन जी महाराज ने बताया रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Life Lessons: मनुष्य अपने वर्तमान को स्वीकार कर ले और उसमें संतुष्ट रहना सीख जाए, तो उसका मन स्वतः शांत होने लगता है। 
 

Rajan Ji Maharaj
Inspirational Thoughts: पूज्य राजन जी महाराज बताते हैं कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह वर्तमान में जीना भूल जाता है। उसका मन हमेशा भविष्य की चिंताओं और इच्छाओं में उलझा रहता है। जब तक मन शांत नहीं होगा, तब तक जीवन में श्रेष्ठ विचार भी नहीं आ सकते। अशांत मन हमेशा परेशान रहता है और सही निर्णय लेने में भी कठिनाई महसूस करता है। इसलिए सबसे पहले अपने मन को शांत करना आवश्यक है।

मन तभी शांत होगा जब हम अपने वर्तमान को स्वीकार करना सीखेंगे। आज जो हमारे पास है, उसका सम्मान करेंगे और उसमें संतुष्टि महसूस करेंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें आगे बढ़ने की इच्छा छोड़ देनी चाहिए, बल्कि इसका मतलब यह है कि आज जो मिला है, उसके लिए भगवान का धन्यवाद करें और उसी संतोष के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करें। जब मन में संतोष होता है, तब जीवन में खुशी और शांति दोनों बनी रहती हैं।

असंतोष ही दुख का कारण

महाराज जी एक सरल उदाहरण देकर समझाते हैं कि जो व्यक्ति नीचे बैठा है, वह सोचता है कि काश मुझे कुर्सी मिल जाए। जिसे कुर्सी मिल गई, वह सोचता है कि अगर सोफे पर बैठने का अवसर मिल जाए तो अधिक सुख मिलेगा। जो सोफे पर बैठा है, वह मंच पर बैठने की इच्छा करता है। इस प्रकार हर व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं है और हमेशा उससे आगे की इच्छा करता रहता है। यही असंतोष उसके दुख का सबसे बड़ा कारण बन जाता है।

वर्तमान का आनंद लेना सीखें

मनुष्य भविष्य की कल्पनाओं में इतना खो जाता है कि वर्तमान की खुशियों का आनंद ही नहीं ले पाता। जो उसके पास है, उसकी कद्र नहीं करता और जो अभी उसके पास नहीं है, उसी के बारे में सोचकर दुखी होता रहता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी सच्ची खुशी का अनुभव नहीं कर सकता। जीवन का वास्तविक आनंद तभी मिलता है जब हम वर्तमान क्षण को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और उसका आनंद लेते हैं।

संतोष का अर्थ प्रयास छोड़ना नहीं

कई लोग सोचते हैं कि यदि संतोष कर लिया तो आगे बढ़ने की प्रेरणा समाप्त हो जाएगी, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। संतोष का अर्थ आलस्य या कर्म छोड़ देना नहीं है। इसका सही अर्थ है कि आज जो प्राप्त है, उसे पर्याप्त मानकर खुशी से स्वीकार करें और बिना चिंता, ईर्ष्या या लालच के अपने लक्ष्य की ओर निरंतर प्रयास करते रहें। संतोष और परिश्रम दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

संतोष के साथ करते रहें कर्म 

राजन जी महाराज का संदेश बहुत सरल और जीवन को सुखी बनाने वाला है। यदि मनुष्य अपने वर्तमान को स्वीकार कर ले और उसमें संतुष्ट रहना सीख जाए, तो उसका मन स्वतः शांत होने लगता है। शांत मन में ही अच्छे विचार जन्म लेते हैं और वही व्यक्ति जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ पाता है। इसलिए हमें हर दिन यह भावना रखनी चाहिए कि आज जो भगवान ने दिया है, वह आज के लिए पर्याप्त है। इसी संतोष के साथ कर्म करते हुए आगे बढ़ना ही सुखी, सफल और शांत जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।

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श्री राजन जी महाराज
जानिए गुरूजी के बारे मेंश्री राजन जी महाराज

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