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Premanand Ji Maharaj: मनुष्य का पूरा अधिकार है भगवत प्राप्ति करना, जानें क्या कहते हैं प्रेमानंद जी महाराज

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
प्रेमानंद जी महाराज
सार

Bhakti Marg: भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं है, बल्कि अपने प्रत्येक कार्य में भगवान को याद रखना और उनके प्रति समर्पण का भाव रखना है। जब मनुष्य का हृदय प्रेम और भक्ति से भर जाता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन में प्रकट होने लगते हैं।
 

Premanand Ji Maharaj
Bhagavad Prapti: संतों और महापुरुषों ने हमेशा बताया है कि मनुष्य जीवन केवल खाने, कमाने, परिवार चलाने और सांसारिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए नहीं मिला है। यह जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका सबसे बड़ा उद्देश्य भगवान की प्राप्ति करना है। प्रेमानंद जी महाराज भी अपने सत्संगों में बार-बार बताते हैं कि जब हमें मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है, तब हमें यह समझ लेना चाहिए कि भगवान तक पहुँचने का पूरा अधिकार भी हमें मिला है। संसार के अन्य जीव केवल अपने कर्मों के अनुसार जीवन जीते हैं, लेकिन मनुष्य को विवेक, बुद्धि और भक्ति का विशेष वरदान प्राप्त है। इसी कारण वह अपने जीवन को ईश्वर की ओर मोड़ सकता है और भगवत प्राप्ति का मार्ग अपना सकता है।

प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि यदि हमारा जन्म मृत्यु लोक में मनुष्य के रूप में हुआ है, तो भगवान की प्राप्ति करना हमारा अधिकार है। जैसे किसी पुत्र का अपने पिता पर अधिकार होता है, वैसे ही प्रत्येक जीव का भगवान पर अधिकार है, क्योंकि हम सभी उसी परमात्मा के अंश हैं। भगवान किसी विशेष जाति, वर्ग, धनवान या विद्वान व्यक्ति के नहीं हैं। वे सभी के हैं और सभी को समान रूप से प्रेम करते हैं।

अक्सर लोग सोचते हैं कि भगवान की प्राप्ति केवल बड़े संत, तपस्वी या त्यागी लोग ही कर सकते हैं, लेकिन यह धारणा सही नहीं है। भगवान का मार्ग हर व्यक्ति के लिए खुला है। जो भी सच्चे मन से उन्हें पुकारता है, प्रेम करता है और उनकी शरण ग्रहण करता है, वह उनकी कृपा का पात्र बन जाता है। इसलिए किसी को भी अपने आप को अयोग्य नहीं समझना चाहिए।

यह जीवन बन सकता है अंतिम जन्म 

महाराज जी कहते हैं कि हमें यह दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि यह जीवन हमारा अंतिम जन्म बन सकता है। यदि हम भगवान की ओर मुड़ जाएं, नाम जप करें, भक्ति करें और अपने जीवन को उनके चरणों में समर्पित कर दें, तो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। शास्त्रों में भी बताया गया है कि भगवान की प्राप्ति होने पर जीव संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता। अनगिनत योनियों में भटकने के बाद यह अवसर प्राप्त होता है। इसलिए इस अमूल्य समय को केवल सांसारिक इच्छाओं में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। जो व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य भगवान को बना लेता है, उसका जीवन सफल हो जाता है।

भक्ति ही सबसे सरल मार्ग

भगवत प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या या बड़े-बड़े अनुष्ठान आवश्यक नहीं हैं। प्रेमानंद जी महाराज सरल भक्ति, नाम जप और भगवान के प्रति प्रेम को सबसे महत्वपूर्ण बताते हैं। जब व्यक्ति श्रद्धा के साथ भगवान का स्मरण करता है, उनके नाम का जप करता है और अपने हृदय में उनके प्रति प्रेम विकसित करता है, तब उसका मन धीरे-धीरे शुद्ध होने लगता है। भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं है, बल्कि अपने प्रत्येक कार्य में भगवान को याद रखना और उनके प्रति समर्पण का भाव रखना है। जब मनुष्य का हृदय प्रेम और भक्ति से भर जाता है, तब भगवान स्वयं उसके जीवन में प्रकट होने लगते हैं।

भगवत प्राप्ति की ओर निरंतर बढ़ें आगे 

प्रेमानंद जी महाराज का संदेश अत्यंत सरल और प्रेरणादायक है कि मनुष्य का जन्म मिला है तो भगवान की प्राप्ति करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। हमें अपने आप को छोटा, कमजोर या अयोग्य नहीं समझना चाहिए। भगवान सभी के हैं और उनकी कृपा पाने का मार्ग सभी के लिए खुला है। यदि हम सच्चे मन से भक्ति करें, भगवान का नाम जपें और उनके चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दें, तो यही जन्म हमारा अंतिम जन्म बन सकता है। इसलिए मनुष्य जीवन के इस अनमोल अवसर का सदुपयोग करते हुए हमें अपने वास्तविक लक्ष्य, अर्थात् भगवत प्राप्ति, की ओर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।

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