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Pradeep Mishra Ji Maharaj: आज के रक्षाबंधन से क्या खो गई है रिश्तों की मिठास? प्रदीप मिश्रा जी ने बताया कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज
सार

Raksha Bandhan: रक्षाबंधन केवल राखी बांधने और उपहार देने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, त्याग और जीवनभर साथ निभाने का पर्व है। यदि इस रिश्ते में लेनदेन और स्वार्थ की भावना आ जाएगी, तो इसकी पवित्रता धीरे-धीरे कम हो जाएगी। 
 

Pandit Pradeep Mishra Ji Maharaj
Raksha Bandhan Importance: रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने के वचन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा करने का संकल्प लेता है। यह रिश्ता केवल एक धागे का नहीं, बल्कि भावनाओं, अपनापन और विश्वास का होता है। लेकिन समय के साथ इस त्योहार की भावना में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। इसी विषय पर पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आज रिश्तों में प्रेम कम और लेनदेन की भावना अधिक दिखाई देने लगी है।

पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज बताते हैं कि पहले जब रक्षाबंधन आता था, तब भाई-बहन के मन में किसी प्रकार का हिसाब-किताब नहीं होता था। बहन केवल अपने भाई को राखी बांधने जाती थी और भाई अपनी क्षमता के अनुसार बहन को कोई उपहार दे देता था। उस समय उपहार का मूल्य नहीं देखा जाता था, बल्कि उसके पीछे छिपा प्रेम और अपनापन सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता था। रिश्तों की मिठास सच्चे स्नेह और सम्मान से बनी रहती थी।

आज रिश्तों में बढ़ गया है लेनदेन का भाव

महाराज जी कहते हैं कि आज के समय में कई जगह रक्षाबंधन का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई देता है। कई बार बहन यह सोचकर जाती है कि उसने भाई के लिए महंगा सामान खरीदा है, इसलिए बदले में उसे भी उतना ही मूल्यवान उपहार मिलना चाहिए। वहीं कुछ भाई भी यह सोचने लगते हैं कि यदि वे बहन को कुछ धन दे रहे हैं तो बहन भी उतनी ही कीमत का उपहार या मिठाई लेकर आए। इस प्रकार त्योहार प्रेम का नहीं, बल्कि लेनदेन का माध्यम बनता जा रहा है। जब रिश्तों में अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं, तब भावनाएं पीछे छूटने लगती हैं।

रिश्ता संपत्ति का नहीं, विपत्ति का भी

पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज समझाते हैं कि भाई का वास्तविक धर्म केवल संपत्ति बांटना नहीं, बल्कि बहन के दुख और संकट में उसके साथ खड़ा होना है। जीवन में सुख के समय साथ देने वाले बहुत मिल जाते हैं, लेकिन कठिन परिस्थितियों में जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़ा रहे, वही सच्चा अपना कहलाता है। भाई-बहन का रिश्ता भी इसी भावना पर आधारित होना चाहिए। यदि भाई अपनी बहन की परेशानी को अपना दुख समझे और बहन भी भाई के सुख-दुख में सहभागी बने, तभी इस रिश्ते की वास्तविक गरिमा बनी रहती है।

संपत्ति के लिए बढ़ते विवाद चिंता का विषय

महाराज जी कहते हैं कि आज कई परिवारों में माता-पिता के रहते तो सब साथ रहते हैं, लेकिन उनके जाने के बाद सबसे पहले संपत्ति के बंटवारे की बातें शुरू हो जाती हैं। हर कोई अपने अधिकार की बात करता है और अपना हिस्सा मांगने लगता है। ऐसे समय में रिश्तों की मिठास धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। संपत्ति बांटने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन परिवार की विपत्ति और कठिन समय को बांटने वाले लोग बहुत कम दिखाई देते हैं। यही आज के समाज की सबसे बड़ी विडंबना है।

कठिन समय में भगवान ही सहारा

महाराज जी अपने प्रवचन में अंत में यह संदेश देते हैं कि जब मनुष्य के कठिन समय में अपने भी साथ छोड़ देते हैं, तब केवल भगवान ही सच्चे सहायक बनते हैं। भगवान शिव और उनकी भक्ति मनुष्य को हर संकट से निकलने की शक्ति देती है। श्रद्धा से अर्पित किया गया एक लोटा जल भी महादेव तक पहुंचता है और भक्त के जीवन में साहस, विश्वास और मानसिक शांति का संचार करता है। इसलिए मनुष्य को केवल रिश्तों पर ही नहीं, बल्कि ईश्वर पर भी अटूट विश्वास रखना चाहिए।

रिश्ते में लेनदेन और स्वार्थ की भावना 

रक्षाबंधन केवल राखी बांधने और उपहार देने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, त्याग और जीवनभर साथ निभाने का पर्व है। यदि इस रिश्ते में लेनदेन और स्वार्थ की भावना आ जाएगी, तो इसकी पवित्रता धीरे-धीरे कम हो जाएगी। पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज का संदेश यही है कि भाई-बहन का संबंध धन और संपत्ति से नहीं, बल्कि प्रेम, सहयोग और कठिन समय में एक-दूसरे का साथ निभाने से मजबूत बनता है। जब रिश्तों में निस्वार्थ प्रेम रहेगा, तभी रक्षाबंधन का वास्तविक महत्व और उसकी मिठास हमेशा बनी रहेगी।

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