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Sanjeev Krishna Thakur Ji Maharaj: विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या पर पूरे समाज को चिंतन की क्यों है आवश्यकता?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज
सार

Youth Mental Health: बच्चों को केवल पढ़ाई में सफल बनने की नहीं, बल्कि जीवन को समझने और हर परिस्थिति का सामना करने की शिक्षा दी जाए। उन्हें यह बताया जाए कि असफलता अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत का अवसर होती है। 
 

Sanjeev Krishna Thakur Ji Maharaj
Students Mental Health: आज के समय में विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन चुकी हैं। जब कोई बच्चा अपनी जिंदगी खत्म करने जैसा कदम उठाता है, तो यह केवल कुछ सेकंड का निर्णय नहीं होता, बल्कि उसके पीछे लंबे समय तक चला मानसिक संघर्ष, अकेलापन और दबाव छिपा होता है। इस विषय पर अपने विचार रखते हुए संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज ने कहा कि आत्महत्या केवल एक कृत्य है, लेकिन उससे पहले बनने वाला वातावरण कहीं अधिक गंभीर होता है। कोई भी बच्चा जन्म से हार मानने वाला नहीं होता और न ही वह अपनी जिंदगी को छोड़ना चाहता है।

संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज का कहना है कि जब कोई 15 या 16 वर्ष का विद्यार्थी आत्महत्या करता है, तो यह समझना जरूरी है कि उसने उस अंतिम क्षण तक पहुंचने से पहले कितनी पीड़ा सही होगी। वह कई रातों तक घुटन में जीया होगा। संभव है कि उसने कई बार अपनी भावनाओं को कागज पर लिखने की कोशिश की हो, सुसाइड लेटर भी लिखा हो और फिर उसे फाड़ दिया हो। शायद उसने अपने माता-पिता को सोते हुए देखा हो और मन में यह विचार आया हो कि उन्हें छोड़कर जाना ठीक नहीं है। लेकिन जब उसे हर तरफ से निराशा ही मिली, तब वह उस भयावह निर्णय तक पहुंच गया। इसलिए केवल अंतिम घटना को देखने के बजाय उसके पीछे के मानसिक संघर्ष को समझना जरूरी है।

अंकों की दौड़ ने बच्चों से छीन ली मासूमियत

आज का समाज बच्चों को बचपन से ही सफलता की ऐसी दौड़ में धकेल देता है, जहां हर समय केवल अच्छे नंबर, बड़ी उपलब्धियां और दूसरों से आगे निकलने का दबाव रहता है। यदि परीक्षा में अपेक्षा के अनुसार परिणाम नहीं आता, तो कई बच्चे खुद को असफल मान लेते हैं। उन्हें लगता है कि अब उनके जीवन का कोई मूल्य नहीं बचा। यह सोच बेहद खतरनाक है। बच्चों को यह एहसास कराया जाना चाहिए कि परीक्षा के अंक जीवन का अंतिम सच नहीं हैं। सफलता और असफलता जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन जीवन स्वयं सबसे बड़ा अवसर है।

परिवार और समाज की भूमिका जरूरी

किसी भी बच्चे के जीवन में परिवार, शिक्षक और समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि माता-पिता केवल पढ़ाई और अंकों पर ही ध्यान देंगे, तो बच्चा अपने मन की बातें साझा करने से डरने लगेगा। बच्चों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहां वे बिना किसी भय के अपनी परेशानियां बता सकें। उनकी भावनाओं को समझना, उनसे खुलकर बातचीत करना और उन्हें यह विश्वास दिलाना कि हर परिस्थिति में परिवार उनके साथ खड़ा है, बहुत जरूरी है। जब बच्चा अपने आपको सुरक्षित और स्वीकार किया हुआ महसूस करता है, तब वह कठिन परिस्थितियों का भी सामना करने की ताकत जुटा लेता है।

पूरे देश के लिए चिंतन का विषय

संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज का मानना है कि यदि कोई विद्यार्थी केवल कम अंक आने या परीक्षा में असफल होने के कारण आत्महत्या कर लेता है, तो यह किसी एक परिवार की नहीं बल्कि पूरे समाज और देश की चिंता का विषय है। इस पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। हमें यह सोचना होगा कि आखिर हमने ऐसा माहौल क्यों बना दिया, जहां बच्चे छोटी-सी असफलता को जीवन का अंत मानने लगे हैं। शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक अपेक्षाएं और प्रतिस्पर्धा का बढ़ता दबाव मिलकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं।

बच्चों को जीवन का महत्व समझाने की जरूरत

आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि बच्चों को केवल पढ़ाई में सफल बनने की नहीं, बल्कि जीवन को समझने और हर परिस्थिति का सामना करने की शिक्षा दी जाए। उन्हें यह बताया जाए कि असफलता अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत का अवसर होती है। परिवार, स्कूल और समाज मिलकर ऐसा सकारात्मक वातावरण बनाएं, जहां बच्चे अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त कर सकें और किसी भी समस्या में अकेला महसूस न करें। यदि हम समय रहते बच्चों की मानसिक स्थिति को समझने का प्रयास करेंगे, तो अनेक अनमोल जीवन बचाए जा सकते हैं। यही सच्चे अर्थों में समाज की जिम्मेदारी है और यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।

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