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Chatur Narayan Ji Maharaj: बच्चों के बिगड़ने का क्या है असली कारण? चतुर नारायण जी महाराज ने बताया सच

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कथावाचक चतुर नारायण जी महाराज
सार

Dasya Bhakti: आज के समय में मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट बच्चों के जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। महाराज के अनुसार, यदि इनका उपयोग सही दिशा में न हो तो यह बच्चों के मन को भटका सकता है। 

Chatur Narayan Ji Maharaj
Ram Katha Pravachan: चतुर नारायण जी महाराज के प्रवचन के संदर्भ में “बच्चों के बिगड़ने का असली कारण” को केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक कारणों का परिणाम बताया जाता है। इसे सरल भाषा में समझें तो इसका मूल संदेश यह है कि बच्चे वैसे बनते हैं जैसा वातावरण और संस्कार उन्हें मिलते हैं। महाराज बताते हैं कि आज सबसे बड़ा कारण यह है कि माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय कम हो गया है। पहले परिवार में बैठकर रामकथा, भजन और अच्छे संस्कारों की बातें होती थीं, जिससे बच्चों का मन धीरे-धीरे नैतिकता की ओर बढ़ता था। अब मोबाइल, काम और भागदौड़ के कारण संवाद कम हो गया है, जिससे बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं और गलत संगति की ओर आकर्षित हो जाते हैं।

आज के समय में मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट बच्चों के जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। महाराज के अनुसार, यदि इनका उपयोग सही दिशा में न हो तो यह बच्चों के मन को भटका सकता है। इसके साथ ही गलत मित्र मंडली भी बच्चों को ऐसी आदतों की ओर ले जाती है जो उनके संस्कारों के विपरीत होती हैं। प्रवचन में यह भी कहा गया है कि बच्चा वही सीखता है जो वह घर में देखता है। यदि घर में झगड़ा, क्रोध, असत्य या असंयम का वातावरण होगा तो बच्चा वही अपनाएगा। इसलिए माता-पिता को स्वयं अपने व्यवहार को सुधारना चाहिए, क्योंकि बच्चा सबसे पहले उन्हें ही आदर्श मानता है।

संस्कार और धर्म से दूरी

महाराज यह भी समझाते हैं कि जब बच्चों को धार्मिक कथाओं, अच्छे ग्रंथों और नैतिक शिक्षाओं से दूर कर दिया जाता है, तो उनका मन केवल भौतिक चीजों की ओर भागने लगता है। रामायण, महाभारत जैसी कथाएँ केवल धार्मिक नहीं बल्कि जीवन जीने की शिक्षा देती हैं। इनसे दूरी भी एक बड़ा कारण माना गया है। चतुर नारायण जी महाराज बताते हैं कि जब भगवान श्रीराम बाल रूप में अयोध्या में प्रकट हुए, तब केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि देवता, ऋषि और भक्त भी उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे। 

कथा के अनुसार राजा दशरथ ने अपने वचन का पालन करते हुए बालक राम को जटायु के सामने रखा। जटायु ने अपने पंख फड़फड़ाकर बालक राम के प्रति प्रेम प्रकट किया। यह देखकर रानियां और सैनिक घबरा गए कि इतने कोमल बालक को एक पक्षी के सामने क्यों रखा गया है। तब जटायु ने राजा दशरथ से कहा कि आपने अपना वचन निभाकर राम को मुझे दे दिया, लेकिन इनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी मैं आपको ही सौंपता हूँ, क्योंकि मैं वन में रहने वाला पक्षी हूं। इस प्रकार जटायु ने प्रेमपूर्वक राम को फिर से दशरथ को लौटा दिया। 

पूरी अयोध्या आनंद में डूबी

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग के माध्यम से संकेत दिया कि जब कोई व्यक्ति अपना सर्वस्व भगवान को समर्पित करता है, तो भगवान उसे और अधिक सम्मान और कृपा के साथ लौटा देते हैं। भगवान राम के जन्म के बाद पूरी अयोध्या आनंद में डूब गई। गुरु वशिष्ठ जी भी किसी न किसी बहाने से प्रतिदिन महल पहुंच जाते थे। वास्तव में उन्हें कोई विशेष कार्य नहीं होता था, बल्कि वे बालक राम के दर्शन करने की इच्छा से बार-बार महल आते थे। महाराज दशरथ भी समझते थे कि गुरुदेव को किसी बात की याद नहीं आई है, बल्कि वे रामलला के दर्शन के आकर्षण से खिंचे चले आते हैं।

कथा में वर्णन मिलता है कि अयोध्या में ऐसा आनंद छा गया कि लोगों को दिन और रात का भी भान नहीं रहा। तुलसीदास जी कहते हैं कि मानो एक महीने का दिन हो गया हो। इसका एक अर्थ यह है कि भगवान की इच्छा से सब कुछ संभव है, और दूसरा अर्थ यह कि आनंद में डूबे लोगों को समय के बीतने का एहसास ही नहीं हुआ।

भगवान शिव की राम दर्शन की लालसा

भगवान शिव माता पार्वती को यह कथा सुनाते हुए एक रोचक प्रसंग बताते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने भी एक प्रकार की "चोरी" की थी। यह चोरी किसी वस्तु की नहीं, बल्कि रामलला के दर्शन करने की थी। भगवान शिव को जब पता चला कि भगवान राम बाल रूप में अयोध्या में अवतरित हुए हैं, तो वे स्वयं को रोक नहीं सके। वे ज्योतिषी का वेश धारण करके अयोध्या पहुंचे और उनके साथ कागभुशुण्डि भी थे। लेकिन महल के बाहर इतनी भीड़ थी कि भीतर प्रवेश करना असंभव लग रहा था। तब उन्होंने एक योजना बनाई। वे नगर के चौराहे पर बैठ गए और लोगों को अपना भाग्य बताने लगे। परंतु उस समय सभी लोग रामलला के दर्शन में इतने मग्न थे कि किसी को अपना भविष्य जानने की इच्छा ही नहीं थी।

माता पार्वती का सहयोग

जब कोई उपाय सफल नहीं हुआ, तब माता पार्वती ने दासी का रूप धारण किया। उन्होंने महारानी कौशल्या से जाकर कहा कि नगर में एक बहुत विद्वान ज्योतिषी आए हैं और उन्हें राजकुमारों का भविष्य देखना चाहिए। कौशल्या जी ने उनकी बात मान ली और भगवान शिव को महल में बुलवा लिया। महल पहुंचकर भगवान शिव ने बालक राम के दर्शन किए। उस समय वे अपने जीवन को धन्य मान रहे थे। उन्होंने बालकों के उज्ज्वल भविष्य का वर्णन किया और माताओं को बताया कि आगे चलकर महान घटनाएँ घटेंगी। उन्होंने संकेत दिया कि एक दिन एक महर्षि आएंगे और राम-लक्ष्मण को अपने साथ ले जाएंगे, जिसके परिणामस्वरूप उनके विवाह का शुभ अवसर भी आएगा।

भगवान शिव की अद्भुत भक्ति

महाराज बताते हैं कि भगवान शिव भक्ति के सभी रसों का आनंद लेते हैं। वे वात्सल्य भाव में बालक राम के दर्शन करते हैं। माधुर्य भाव में वे गोपी स्वरूप धारण कर भगवान कृष्ण की रासलीला में सम्मिलित होते हैं। दास्य भाव में वे हनुमान के रूप में भगवान की सेवा करते हैं। सखा भाव और शांत भाव का भी वे पूर्ण अनुभव करते हैं। यही कारण है कि भगवान शिव को महानतम भक्तों में गिना जाता है।

नामकरण संस्कार और गुरु वशिष्ठ का आनंद

कुछ समय बाद जब रामलला दस दिन के हुए, तब उनके नामकरण संस्कार की तैयारी हुई। राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ से यह संस्कार सम्पन्न करने का निवेदन किया। वशिष्ठ जी अत्यंत प्रसन्न हुए। वे ब्रह्माजी के पुत्र थे और प्रारंभ में राजपुरोहित बनने के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि वे भजन और तपस्या में जीवन बिताना चाहते थे। लेकिन ब्रह्माजी के आदेश से उन्होंने सूर्यवंश का मार्गदर्शन स्वीकार किया। जब उन्हें भगवान राम का नामकरण करने का अवसर मिला, तो उनका हृदय आनंद से भर गया। उन्हें अनुभव हुआ कि यह केवल एक राजकुमार का नामकरण नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की सेवा का दुर्लभ अवसर है। इसी भावना के साथ उन्होंने राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नामकरण संस्कार को सम्पन्न किया और अयोध्या का उत्सव और भी मंगलमय हो गया।

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