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Swami Ashutoshanand Giri Ji: भजन में मन लगाने का क्या है गुप्त तरीका? स्वामी आशुतोषानंद गिरि महाराज ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Bhakti Path: भजन में मन लगाने का गुप्त तरीका यही है कि व्यक्ति बहाने बनाना छोड़ दे और बिना किसी शर्त के भगवान का स्मरण शुरू कर दे। जो व्यक्ति यह सोचता रहता है कि पहले सब कुछ ठीक हो जाए फिर भजन करूंगा, वह कभी भजन नहीं कर पाता है। 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Bhakti Motivation in Life: स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि अधिकांश लोग भगवान का भजन करने के लिए किसी विशेष परिस्थिति का इंतजार करते रहते हैं। वे सोचते हैं कि पहले जीवन की समस्याएं समाप्त हो जाएं, धन-संपत्ति मिल जाए, शरीर स्वस्थ हो जाए, तब भजन करेंगे, लेकिन ऐसा समय कभी नहीं आता। जो व्यक्ति आज भजन नहीं कर रहा, वह भविष्य में भी भजन नहीं करेगा। इसलिए भगवान का स्मरण और भजन वर्तमान क्षण से ही शुरू कर देना चाहिए।

महाराज जी ने रामायण का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब भगवान श्रीराम ने सुग्रीव की सहायता की और उसे उसका राज्य वापस दिलाने का वचन दिया, तब सुग्रीव ने कहा कि प्रभु कृपा करें ताकि वह सब कुछ छोड़कर दिन-रात भगवान का भजन कर सके, लेकिन लक्ष्मण जी समझ गए कि यह केवल कहने की बात है। वास्तव में सुग्रीव पहले राज्य, धन और सुख प्राप्त करना चाहता था, फिर भजन करने की बात कर रहा था। जब उसे सब कुछ मिल गया तब भी वह भजन में नहीं लगा। इससे स्पष्ट होता है कि भजन के लिए बाहरी सुविधाएं नहीं, बल्कि आंतरिक इच्छा आवश्यक है।

मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति

महाराज जी ने बताया कि मनुष्य अक्सर भगवान के साथ भी सौदेबाजी करता है। वह कहता है कि यदि मुझे इतना धन मिल जाए तो मैं उसका कुछ भाग दान कर दूंगा, लेकिन जब धन प्राप्त हो जाता है तो उसका मन बदल जाता है। मनुष्य अपनी सुविधा और लाभ के अनुसार भगवान को याद करता है। यही कारण है कि उसकी भक्ति स्थिर नहीं हो पाती। सच्चा भक्त बिना किसी शर्त के भगवान का स्मरण करता है।

केवल काटना नहीं, फुफकारना भी जरूरी

प्रवचन में एक सांप की कथा भी सुनाई गई। एक महात्मा ने एक विषैले सांप को समझाया कि वह लोगों को काटना छोड़ दे। सांप ने उनकी बात मान ली, लेकिन लोगों ने उसकी कमजोरी का फायदा उठाना शुरू कर दिया और उसे बहुत कष्ट पहुंचाया। बाद में महात्मा ने कहा कि मैंने काटने से मना किया था, फुफकारने से नहीं। इसका अर्थ है कि जीवन में अहिंसा और सज्जनता आवश्यक है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए साहस और आत्मसम्मान भी जरूरी है।

विभीषण की नीति और रावण का अहंकार

महाराज जी ने आगे बताया कि जब भगवान श्रीराम की सेना समुद्र तट पर पहुंची, तब लंका में विभीषण ने रावण को समझाया कि यदि वह अपना कल्याण चाहता है तो माता सीता को सम्मानपूर्वक वापस लौटा दे। विभीषण ने कहा कि पराई स्त्री पर बुरी दृष्टि डालना विनाश का कारण बनता है, लेकिन रावण अपने अहंकार में इतना डूबा हुआ था कि उसने अपने भाई की बात नहीं मानी और उसे सभा से अपमानित करके निकाल दिया।

भगवान की शरण में आने वाला कभी नहीं छूटता

जब विभीषण लंका छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में आए, तब वानर सेना में कई लोगों ने उन पर संदेह किया। किसी ने उन्हें बंदी बनाने की सलाह दी तो किसी ने मार देने की, लेकिन भगवान श्रीराम ने स्पष्ट कहा कि जो भी उनकी शरण में आता है, उसे वे कभी नहीं छोड़ते। भगवान ने विभीषण को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया और उन्हें अपना भक्त बना लिया।

भजन में मन लगाने का वास्तविक रहस्य

महाराज जी के अनुसार भजन में मन लगाने का गुप्त तरीका यही है कि व्यक्ति बहाने बनाना छोड़ दे और बिना किसी शर्त के भगवान का स्मरण शुरू कर दे। जो व्यक्ति यह सोचता रहता है कि पहले सब कुछ ठीक हो जाए फिर भजन करूंगा, वह कभी भजन नहीं कर पाता है। भगवान का नाम, सत्संग, विनम्रता और शरणागति ही वह मार्ग है जिससे मन स्थिर होता है और भक्ति में आनंद प्राप्त होता है।

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