Rohini Vrat 2025 Date And Time: जैन धर्म और हिंदू परंपराओं में रोहिणी व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक शुद्धि और सुख-समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह भक्तों के जीवन में शांति, समृद्धि और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है। रोहिणी व्रत हर महीने रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में मनाया जाता है और सितंबर 2025 में यह पवित्र व्रत विशेष शुभ मुहूर्त के साथ भक्तों के लिए खास अवसर लेकर आ रहा है। आइए, रोहिणी व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और इसके महत्व को के बारे में जानते हैं।
रोहिणी व्रत का महत्व
रोहिणी व्रत जैन धर्म के अनुयायियों और कुछ हिंदू भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दौरान रखा जाता है, जो चंद्रमा के 27 नक्षत्रों में से एक है। जैन धर्म में इस व्रत का पालन विशेष रूप से भगवान वासुपूज्य की पूजा के लिए किया जाता है, जो जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर हैं। हिंदू परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु और चंद्रमा की पूजा भी की जाती है। यह व्रत आत्म-शुद्धि, कर्मों के नाश और सुख-शांति की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
रोहिणी व्रत की तिथि
पंचांग के अनुसार, सितंबर 2025 में रोहिणी व्रत 14 सितंबर 2025, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव प्रबल रहेगा। रोहिणी नक्षत्र का संयोग 15 सितंबर 2025 को सुबह 8:41 बजे तक रहेगा। इस व्रत को अष्टमी तिथि के साथ जोड़ा गया है, जो 15 सितंबर 2025 को सुबह 3:06 बजे तक प्रभावी रहेगी।
शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:10 बजे से 4:57 बजे तक
प्रातः संध्या: सुबह 4:34 बजे से 5:43 बजे तक
अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:29 बजे से दोपहर 12:18 बजे तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 1:57 बजे से 2:46 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 6:03 बजे से 6:26 बजे तक
अमृत काल: रात 11:09 बजे से 12:40 बजे
निशिता मुहूर्त: रात 11:30 बजे से 12:17 बजे
इन शुभ मुहूर्तों में पूजा करने से भगवान वासुपूज्य और चंद्रमा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
रोहिणी व्रत की पूजन विधि
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें।
- स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर जाएं और भगवान वासुपूज्य या चंद्रमा की पूजा का संकल्प लें। संकल्प लेते समय हाथ में जल लेकर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें।
- पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें और स्वच्छ आसन बिछाएं।
- भगवान वासुपूज्य की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। यदि मूर्ति उपलब्ध न हो तो चंद्रमा का ध्यान करें।
- भगवान वासुपूज्य को फल, फूल, गंध, दूर्वा, नैवेद्य, और सफेद चंदन अर्पित करें।
- चंद्रमा की पूजा के लिए जल और दूध का मिश्रण तैयार करें।
- संध्या के समय चंद्रमा को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय मंत्रों का जाप करें।
- चंद्र देव के बीज मंत्र का 108 बार जाप करें।
- पूजा के अंत में कपूर जलाकर भगवान वासुपूज्य या चंद्रमा की आरती करें।
- पूजा स्थल पर 3 या 7 बार परिक्रमा करें।
- सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन या फलाहार ग्रहण करें।
- गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें, जो इस व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- अगले दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य दें और विधिवत पूजा के बाद व्रत का पारण करें।[
रोहिणी व्रत का धार्मिक महत्व
रोहिणी व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। जैन धर्म में इस व्रत को आत्मा की शुद्धि और कर्मों के नाश के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इसे करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। विशेष रूप से महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, शांति और भावनाओं का कारक माना जाता है। रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र है, इसलिए इस दिन चंद्रमा की पूजा से मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है। यह व्रत गृहस्थ जीवन में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को बढ़ाता है। यह परिवार में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।
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