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Maa Kushmanda Vrat Katha: नवरात्रि के चौथे दिन करें इस कथा का पाठ, प्रसन्न हो जाएंगी मां कुष्मांडा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Maa Kushmanda Vrat Katha In Hindi: चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। क्योंकि मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा का ही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा पाठ और व्रत कथा किया जाता है।

Maa Kushmanda Vrat Katha
Maa Kushmanda Vrat Katha In Hindi: चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। क्योंकि मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा का ही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा पाठ और व्रत कथा किया जाता है। साथ ही साथ उन्हें मिठाई फल तथा भोग भी अर्पित करते हैं। मां कुष्मांडा को मालपुआ बहुत ही ज्यादा पसंद है। इसलिए मां कुष्मांडा की पूजा में मालपुआ का समावेश करना चाहिए। मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की अलग-अलग कथाएं हैं। तो आज इस खबर में कुंष्मांडा से जुड़े व्रत कथा के बारे में जानेंगे। तो आइए मां कुष्मांडा की व्रत कथा विस्तार से जानते हैं।

मां कुष्मांडा की व्रत कथा

सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित है कि प्राचीन काल में त्रिदेवों ने सृष्टि की रचना करने का संकल्प लिया। उस समय संपूर्ण ब्रह्मांड में घना अंधकार था। संपूर्ण ब्रह्मांड एकदम शांत था, कोई संगीत नहीं था, कोई ध्वनि नहीं थी, केवल एक गहन मौन था। इस स्थिति में त्रिदेवों ने जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा से सहायता की प्रार्थना की। 

जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा ने तत्काल ब्रह्मांड की रचना की। कहा जाता है कि मां कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। मां के चेहरे पर फैली मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। इस प्रकार अपनी मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने के कारण जगत जननी आदिशक्ति मां कूष्मांडा के नाम से जानी जाती हैं। 

मां की महिमा निराली है। मां का निवास सूर्य लोक है। शास्त्रों के अनुसार मां कूष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं। ब्रह्मांड की रचना करने वाली मां कूष्मांडा के चेहरे का तेज सूर्य को भी प्रकाशवान बनाता है। मां सूर्य लोक के अंदर और बाहर हर जगह निवास करने की क्षमता रखती हैं। मां के मुख पर एक तेजोमय आभा प्रकट होती है, जो समस्त जगत का कल्याण करती है। वे सूर्य के समान तेजस्वी तेज से आच्छादित हैं। यह तेज जगत जननी आदिशक्ति मां कूष्मांडा से ही संभव है।

मां कुष्मांडा को प्रसन्न करने के मंत्र

सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च.

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता.

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:..’

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