Ma Kali : हिंदू धर्म में माता दुर्गा के विभिन्न रूपों का अपना विशेष महत्व है और हर रूप की पूजा से अलग-अलग आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। इन्हीं में से एक रूप माता काली का है जिन्हें शक्ति, साहस और दुष्टों के विनाश के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है
Ma Kali : हिंदू धर्म में माता दुर्गा के विभिन्न रूपों का अपना विशेष महत्व है और हर रूप की पूजा से अलग-अलग आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। इन्हीं में से एक रूप माता काली का है जिन्हें शक्ति, साहस और दुष्टों के विनाश के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें आमतौर पर गहरे रंग में दर्शाया जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि माता दुर्गा ने काली का रूप क्यों धारण किया और उन्हें यह नाम कैसे मिला? धार्मिक मान्यताओं और देवी से जुड़ी कथाओं के अनुसार उनके विभिन्न रूपों का गहरा अर्थ है। माना जाता है कि जब भी अधर्म और बुरी शक्तियां हावी होने लगती हैं तो माता अपने भक्तों की रक्षा करने और राक्षसों का विनाश करने के लिए एक उग्र रूप धारण कर लेती हैं। विशेष रूप से माता काली का रूप असीम शक्ति और बुराई के विनाश का प्रतीक है। आइए माता काली के नाम और उनके इस रूप के पीछे की कहानी जानते हैं।
माता ने काली का रूप क्यों धारण किया?
यह कथा एक ऐसे गंभीर संकट के बारे में है जब रक्तबीज नामक राक्षस का आतंक इतना बढ़ गया कि देवताओं और मनुष्यों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। इस राक्षस का वध करना लगभग असंभव था। उसका नाम 'रक्तबीज' था और उसे एक वरदान प्राप्त था यदि उसके रक्त की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस बूंद से तुरंत एक और शक्तिशाली रक्तबीज पैदा हो जाता। इस कारण उसका आतंक लगातार बढ़ता गया। वह राक्षसों शुंभ और निशुंभ का मुख्य सेनापति था और इस अनोखे वरदान ने उसे अत्यंत शक्तिशाली बना दिया था। 'दुर्गा सप्तशती' के अनुसार जब माता दुर्गा ने देवी चंडिका के रूप में देवताओं के कहने पर रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उसके घावों से रक्त की सैकड़ों बूंदें धरती पर गिर गईं। देखते ही देखते उन बूंदों से हज़ारों नए रक्तबीज पैदा हो गए। जैसे-जैसे देवताओं और माता दुर्गा की सेना ने इन नए रक्तबीजों पर हमला किया उनकी संख्या और भी बढ़ती गई। युद्ध के मैदान में हज़ारों फिर लाखों और अंततः करोड़ों रक्तबीज प्रकट हो गए। जिधर भी देखो बस रक्तबीज ही नज़र आ रहे थे। आकाश से लेकर पाताल तक राक्षसों की चीखों और उनके ज़ोरदार अट्टहास से हवा गूंज उठी। भयभीत होकर देवता पीछे हटने लगे। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि रक्तबीज का विनाश करना असंभव सा लगने लगा। ऐसे में उसका संहार करने के लिए देवी दुर्गा ने काली का रूप धारण किया जिन्हें माँ कालिका के नाम से जाना गया।
देवी दुर्गा ने रक्तबीज का विनाश कैसे किया?
जैसे-जैसे रक्तबीज का आतंक बढ़ता गया देवी चंडिका के भीतर विनाश की चेतना जागृत हुई। उनके भृकुटि के बीच से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जो घने अंधकार जैसी थी। इस अंधकार से एक ऐसा भयानक रूप निकला जिसे देखकर स्वयं मृत्यु भी कांप उठे। माँ काली का यह स्वरूप इतना प्रचंड था कि राक्षस तुरंत मरने लगे और रक्तबीज के सभी रूप एक-एक करके नष्ट होने लगे। युद्धभूमि में पहुँचकर, माँ कालरात्रि ने देवी चंडिका से कहा कि वे अपने अस्त्रों से रक्तबीज पर प्रहार करें और वचन दिया कि उसके शरीर से बहने वाले रक्त को वह ज़मीन पर गिरने से पहले ही पी जाएंगी। इसके बाद देवी चंडिका ने रक्तबीज पर आक्रमण कर दिया। जैसे ही उसके शरीर से रक्त की धाराएं बहने लगीं माँ कालरात्रि ने अपनी विशाल जीभ और एक पात्र का उपयोग करके उस रक्त को पकड़ लिया जिससे वह ज़मीन तक नहीं पहुँच पाया। रक्तबीज के साथ-साथ चंड और मुंड का वध करके माँ काली और देवी दुर्गा ने तीनों लोकों को भय से मुक्त कर दिया। माँ काली का क्रोध इतना तीव्र था कि पूरा ब्रह्मांड उनकी क्रोधाग्नि में जलने लगा। उसी क्षण भगवान शिव ज़मीन पर लेट गए और माँ काली का पैर उन पर जा पड़ा। यह एहसास होते ही कि उनका पैर उनके पति पर है उनका क्रोध शांत हो गया हालाँकि उनकी जीभ बाहर ही रही।