Durga Visarjan: शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने के बाद दशमी तिथि पर देवी की विदाई की जाती है। इस दिन कई जगहों पर महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की परंपरा निभाती हैं। खासतौर पर पश्चिम बंगाल में यह परंपरा बेहद लोकप्रिय है। इस दौरान महिलाएं लाल और सफेद साड़ी पहनकर मां दुर्गा को विदाई देती हैं और उनके सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दुर्गा विसर्जन के समय सिंदूर खेला क्यों किया जाता है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं इस परंपरा से जुड़ी मान्यताओं के बारे में...
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा?
सिंदूर खेला दुर्गा पूजा के अंतिम दिन यानी विजयादशमी पर निभाई जाने वाली एक पारंपरिक रस्म है। इस दिन विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और उनके चरणों तथा माथे पर सिंदूर लगाकर पूजा करती हैं। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान इस रस्म का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं और मां दुर्गा से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।
मां दुर्गा को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है?
हिंदू धार्मिक परंपरा में सिंदूर को सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ सिंदूर धारण करती हैं। इसी मान्यता के आधार पर सिंदूर खेला के दौरान मां दुर्गा को भी सिंदूर अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां दुर्गा की पूजा करने और उन्हें सिंदूर चढ़ाने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। महिलाएं देवी से अपने परिवार की रक्षा, समृद्धि और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं।
सिंदूर खेला का धार्मिक महत्व
सिंदूर खेला को मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उन्हें विदाई देने की रस्म के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और विजयादशमी के दिन अपने धाम लौट जाती हैं। बंगाल की परंपरा में देवी को बेटी के रूप में भी देखा जाता है, इसलिए उनकी विदाई भावनात्मक अवसर होती है। सिंदूर खेला के दौरान महिलाएं मां को सिंदूर लगाकर विदा करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि देवी अगले वर्ष फिर उनके घर आएं। इस रस्म में भक्ति, अपनापन और उत्सव की भावना एक साथ दिखाई देती है।
महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर क्यों लगाती हैं?
सिंदूर खेला में महिलाएं केवल मां दुर्गा को ही सिंदूर नहीं लगातीं, बल्कि एक-दूसरे के माथे और चेहरे पर भी सिंदूर लगाती हैं। इसके पीछे सौभाग्य, सुख और समृद्धि की कामना जुड़ी है। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर वैवाहिक जीवन में खुशहाली और परिवार में मंगल बने रहने की प्रार्थना करती हैं। इसे आपसी प्रेम, सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी माना जाता है। इस दौरान महिलाएं हंसी-खुशी के साथ उत्सव मनाती हैं और एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएं देती हैं।
सिंदूर खेला कैसे किया जाता है?
इस परंपरा में सबसे पहले मां दुर्गा की पूजा की जाती है। इसके बाद विवाहित महिलाएं देवी को पान, मिठाई और सिंदूर जैसी पूजन सामग्री अर्पित करती हैं। फिर मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर लगाया जाता है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और देवी से सुखी वैवाहिक जीवन तथा परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। अलग-अलग स्थानों और पूजा समितियों में इस रस्म को निभाने के तरीके में कुछ अंतर हो सकता है। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है और भक्त अगले वर्ष देवी के दोबारा आगमन की कामना करते हैं।
बंगाल में क्यों खास है सिंदूर खेला?