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Karwa Chauth: करवा चौथ पर कौन-कौन सी रस्में निभाई जाती हैं? जानें नवविवाहिताओं की परंपरा

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Karwa Chauth Rituals: नवविवाहिताओं के लिए पहला करवा चौथ केवल व्रत का दिन नहीं, बल्कि परिवार की परंपराओं से जुड़ने और अपने जीवनसाथी के साथ रिश्ते को उत्सव के रूप में मनाने का अवसर भी है। 

Karwa Chauth Rituals
Karwa Chauth Puja and Traditions: करवा चौथ का त्योहार सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती हैं। शादी के बाद पहली बार करवा चौथ मनाने वाली नवविवाहिताओं के लिए यह पर्व और भी खास होता है। उनके लिए यह त्योहार नए परिवार की परंपराओं को समझने, रिश्तों में अपनापन बढ़ाने और वैवाहिक जीवन की नई शुरुआत को उत्साह के साथ मनाने का अवसर होता है। करवा चौथ पर सरगी खाने से लेकर सोलह शृंगार करने, पूजा करने, कथा सुनने और चंद्रमा को अर्घ्य देने तक कई रस्में निभाई जाती हैं। आइए जानते हैं कि करवा चौथ पर कौन-कौन सी परंपराएं निभाई जाती हैं और नवविवाहिताओं के लिए इनका क्या महत्व है।

सरगी खाने की रस्म 

करवा चौथ के दिन सरगी खाने की परंपरा काफी प्रचलित है। सरगी आमतौर पर सास अपनी बहू को देती हैं। इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे, मठरी और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं। परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें कपड़े या सुहाग की सामग्री भी दी जाती है। नवविवाहिताएं सुबह सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। मान्यता है कि सरगी सास की ओर से बहू को स्नेह और आशीर्वाद देने का प्रतीक है। हालांकि, सरगी की सामग्री और इसे देने की परंपरा अलग-अलग परिवारों में भिन्न हो सकती है।

सोलह शृंगार करने की परंपरा

करवा चौथ पर महिलाएं सजने-संवरने को विशेष महत्व देती हैं। इस दिन कई महिलाएं लाल, गुलाबी या अपनी पसंद के शुभ रंगों के कपड़े पहनती हैं। वे मेहंदी लगाती हैं और चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछिया तथा अन्य आभूषण पहनकर शृंगार करती हैं। नवविवाहिताओं के लिए यह रस्म खास होती है, क्योंकि शादी के बाद पहला करवा चौथ उनके वैवाहिक जीवन की यादगार शुरुआत का हिस्सा बनता है। कई परिवारों में बहू को साड़ी, गहने या सुहाग की सामग्री उपहार में देने की परंपरा भी होती है। हालांकि, सोलह शृंगार करना आस्था और व्यक्तिगत पसंद से जुड़ा है, इसे किसी तरह की अनिवार्यता नहीं समझना चाहिए।

सास को बायना देने की रस्म

करवा चौथ पर सास को बायना देने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है। बायना में मिठाई, फल, कपड़े, सुहाग की सामग्री, करवा या दक्षिणा रखी जा सकती है। नवविवाहिताएं अपनी सास को श्रद्धा और सम्मान के साथ बायना देती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। यह रस्म बहू और सास के बीच प्रेम, सम्मान और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है। बायने में क्या दिया जाए, यह परिवार की परंपरा और सामर्थ्य पर निर्भर करता है। इसका महत्व उपहार की कीमत से अधिक भावनाओं और रिश्तों में माना जाता है।

शाम को होती है करवा चौथ की पूजा

करवा चौथ के दिन शाम को महिलाएं पूजा की तैयारी करती हैं। पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश, भगवान शिव, माता पार्वती और करवा माता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद दीपक जलाकर रोली, अक्षत, फूल, मिठाई और करवा सहित पूजा की सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के दौरान महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं एक साथ बैठकर पूजा करती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। वीरावती की कथा सहित व्रत से जुड़ी अन्य प्रचलित कथाएं भी सुनाई जाती हैं। कथा सुनना इस पर्व की महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल है।

चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है व्रत

करवा चौथ की सबसे प्रमुख रस्म चंद्रमा के दर्शन और पूजा से जुड़ी है। रात में चंद्रमा निकलने पर महिलाएं उसकी दिशा में मुख करके जल से अर्घ्य देती हैं। कई परिवारों में महिलाएं छलनी से चंद्रमा के दर्शन करती हैं और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति के हाथों से जल ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा प्रचलित है। हालांकि, व्रत खोलने की रस्म और उसका क्रम अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़ा भिन्न हो सकता है। चंद्रोदय का समय भी शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय समय की जानकारी लेना उचित है।

नवविवाहिताओं के लिए क्यों खास है करवा चौथ?

नवविवाहिताओं के लिए पहला करवा चौथ केवल व्रत का दिन नहीं, बल्कि परिवार की परंपराओं से जुड़ने और अपने जीवनसाथी के साथ रिश्ते को उत्सव के रूप में मनाने का अवसर भी है। सरगी, शृंगार, बायना, पूजा और चंद्र दर्शन जैसी रस्में इस त्योहार को खास बनाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ पर श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कामना की जाती है। इस दिन का वास्तविक भाव प्रेम, सम्मान, आपसी समझ और परिवार के साथ खुशियां बांटने में निहित है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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