Karwa Chauth History: कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चौथ का त्योहार न केवल पत्नियों के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि यह एक ऐसी पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, जो देवलोक से शुरू होकर मानव जीवन तक पहुंची। इस दिन सुहागिनें सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं, अपने पतियों की लंबी आयु और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना करती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस व्रत की जड़ें देवियों के समय में हैं? पौराणिक ग्रंथों और लोक कथाओं के अनुसार, सबसे पहले देवलोक की देवियों ने ही यह व्रत रखा था, जब देवता राक्षसों के अत्याचार से त्रस्त थे। यह कथा न केवल व्रत की उत्पत्ति बताती है, बल्कि पति-पत्नी के बंधन की पवित्रता की कहानी भी बयां करती है। आइए, जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा...
देवताओं की पत्नियों ने की शुरुआत
पुराणों के अनुसार, करवा चौथ व्रत की नींव देवलोक में ही पड़ी। एक बार देवताओं और दानवों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। दानवों की सेना इतनी शक्तिशाली हो चुकी थी कि देवता लगातार हारते चले जा रहे थे। इंद्र, वरुण, अग्नि जैसे देवता पराजय के भय से कांप उठे। हार के कगार पर खड़े होकर वे सब ब्रह्माजी के पास पहुंचे और हाथ जोड़कर बोले- प्रभु, हमारी रक्षा कीजिए। दानव हमें नष्ट कर देंगे। ब्रह्माजी ने गहन चिंतन किया और फिर मुस्कुराते हुए कहा- तुम्हारी मुक्ति तुम्हारी ही पत्नियों के हाथ में है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सभी देव पत्नियां निर्जला व्रत रखें। वे अपने पतियों की लंबी आयु और विजय के लिए सच्चे हृदय से प्रार्थना करें। इस व्रत की शक्ति इतनी प्रबल है कि यह युद्ध का रुख ही बदल देगी।
देवताओं की पत्नियां, जिनमें माता लक्ष्मी, सरस्वती, आदि प्रमुख थीं, वे तुरंत तैयार हो गईं। वे जानती थीं कि पति का सुख ही उनका सुख है। चतुर्थी का दिन आया। सुबह से ही उन्होंने स्नान किया, स्वच्छ वस्त्र धारण किए और भगवान शिव-पार्वती की पूजा आरंभ की। पूरे दिन बिना एक बूंद पानी के वे उपवास रहीं, मन में केवल अपने पतियों की विजय की कामना लिए। शाम ढलते-ढलते आकाश में चंद्रमा उदय हुआ। उन्होंने चंद्र देव को अर्घ्य चढ़ाया और व्रत समाप्त किया। चमत्कारिक रूप से, उनकी प्रार्थना का असर हुआ। देवताओं को अपार शक्ति मिली, दानवों का संहार हुआ और स्वर्गलोक में विजय का जश्न छा गया। इस घटना ने न केवल देवताओं को बचा लिया, बल्कि करवा चौथ व्रत को एक अनन्य परंपरा का रूप दिया। आज भी इस कथा को सुनाने का विधान है, क्योंकि यह सिखाती है कि नारी की भक्ति से असंभव भी संभव हो जाता है।
माता पार्वती की तपस्या
यदि देव पत्नियों ने व्रत की नींव रखी तो इसे अमर बनाने वाली पहली देवी माता पार्वती रहीं। शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित इस कथा के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती को बचपन से ही भगवान शिव पर प्रेम हो गया था। वे जानती थीं कि शिव तपस्वी हैं, संन्यासी स्वभाव के, और उन्हें प्रसन्न करना आसान नहीं। पार्वती ने संकल्प लिया कि वे शिव को अपना पति बनाएंगी, चाहे इसके लिए कितना भी कठिन तप क्यों न करना पड़े। उन्होंने कठोर व्रत और तपस्या आरंभ की- कभी सूर्य की किरणों के नीचे खड़ी रहना, कभी बर्फीले हिमालय पर नंगे पैर चलना, कभी केवल फलाहार पर निर्भर रहना, लेकिन इन सबमें सबसे विशेष था करवा चौथ का व्रत।
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को पार्वती ने पहली बार यह व्रत रखा। सुबह उठकर उन्होंने गंगा स्नान किया, पीले वस्त्र पहने और शिवलिंग की स्थापना की। पूरे दिन निर्जला रहते हुए वे शिव का स्मरण करती रहीं। मन में एक ही कामना थी- शिव जी मेरे पति बने और हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय हो। शाम को चंद्रमा निकला तो पार्वती ने अर्घ्य चढ़ाया और प्रार्थना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने कहा- पार्वती, आपकी भक्ति अटल है। आप मेरी अर्धांगिनी बनेगी और आपके व्रत की महिमा से सभी नारियां अपने पतियों के सुखी रहेंगी। इस प्रकार, पार्वती को न केवल शिव पति बने, बल्कि करवा चौथ व्रत को पति की दीर्घायु का सर्वोत्तम साधन बना दिया।
मां सीता का अटूट विश्वास
मां सीता ने भी करवा चौथ व्रत को अपनी भक्ति से और मजबूत किया। लोक मान्यताओं में यह कथा व्यापक रूप से प्रचलित है। जब रावण ने सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका के अशोक वाटिका में कैद कर दिया तो सीता जी का मन टूटा नहीं। वे हर पल राम का स्मरण करती रहीं। कार्तिक चतुर्थी का दिन आया। वाटिका में अकेली, रावण के पहरेदारों के बीच, सीता ने राम के लिए निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया। सुबह उन्होंने वट वृक्ष के नीचे राम की मूर्ति का चिंतन किया, जो उनके मन में बसी थी। पूरे दिन वे उपवास रहीं, भूख-प्यास भूलकर राम की विजय और लौटने की कामना करती रहीं। शाम को चंद्रमा उदित हुआ। सीता ने मन ही मन चंद्र को अर्घ्य दिया और प्रार्थना की।
द्रौपदी की भक्ति