Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के भक्त पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। घरों और मंदिरों में माता की चौकी सजाई जाती है और कलश स्थापना के साथ ज्वारे भी बोए जाते हैं। नौ दिनों तक इन ज्वारों की देखभाल की जाती है और रोजाना पूजा के समय इन्हें जल अर्पित किया जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिन या दशहरे के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई के साथ ज्वारों का विसर्जन भी किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि में ज्वारे क्यों बोए जाते हैं और माता की विदाई के समय इन्हें विसर्जित करने की परंपरा क्यों है? आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक महत्व...
ज्वारे बोने की क्या है परंपरा?
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के साथ कई घरों में मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। इन्हें ज्वारे या जवारे कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ को समृद्धि, खुशहाली और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में ज्वारों का बढ़ना घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का संकेत माना जाता है। भक्त इन ज्वारों को मां दुर्गा के सामने रखकर उनकी पूजा करते हैं और परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं।
मां दुर्गा की विदाई पर ज्वारे क्यों किए जाते हैं विसर्जित?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की उपासना के लिए स्थापित कलश और ज्वारे पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। नौ दिनों तक देवी की आराधना करने के बाद दशमी तिथि पर उनकी विदाई की जाती है। इसी के साथ ज्वारों का विसर्जन करके नवरात्रि की पूजा संपन्न की जाती है। ज्वारों का विसर्जन इस बात का प्रतीक माना जाता है कि पूजा के दौरान बोए गए बीजों से निकली नई हरियाली के माध्यम से जीवन, प्रकृति और समृद्धि के चक्र का सम्मान किया जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में विसर्जन की विधि अलग हो सकती है।
ज्वारे किस बात का देते हैं संकेत?
ज्वारों को जीवन, नई शुरुआत और प्रकृति की उर्वरता से जोड़कर देखा जाता है। मिट्टी में बोए गए जौ के बीज कुछ ही दिनों में अंकुरित होकर हरे पौधों का रूप ले लेते हैं। यह प्रक्रिया प्रकृति की शक्ति और जीवन के विकास का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से भक्त इसे मां दुर्गा की कृपा और घर में खुशहाली की कामना से जोड़ते हैं। कई स्थानों पर ज्वारों की लंबाई और उनके हरे-भरे होने को शुभ संकेत माना जाता है, लेकिन इसे भविष्य की घटनाओं का निश्चित प्रमाण नहीं समझना चाहिए।
ज्वारों का मां दुर्गा से क्या है संबंध?
मां दुर्गा को शक्ति, साहस और कल्याण की देवी माना जाता है। नवरात्रि में उनकी पूजा करते समय ज्वारे अर्पित करना प्रकृति के प्रति श्रद्धा और जीवन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका भी है। जौ प्राचीन समय से भारतीय धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होते रहे हैं। नवरात्रि में इन्हें बोना और नौ दिनों तक इनकी देखभाल करना भक्तों को धैर्य, नियमितता और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश देता है। मां दुर्गा की विदाई के समय ज्वारों का विसर्जन करके भक्त देवी से परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की प्रार्थना करते हैं।
ज्वारे विसर्जित करने की क्या है विधि?
नवरात्रि के अंतिम दिन पूजा के बाद मां दुर्गा को श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार ज्वारों को कलश के पास से उठाकर उनका विसर्जन किया जाता है। कुछ परिवार ज्वारों को बहते जल में प्रवाहित करते हैं, जबकि कई स्थानों पर इन्हें मिट्टी में दबाने या पौधों के पास रखने की परंपरा भी प्रचलित है। विसर्जन करते समय मां दुर्गा का स्मरण किया जाता है और परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है। पर्यावरण का ध्यान रखते हुए ज्वारों को मिट्टी में लगाना या किसी पौधे के पास रखना भी एक अच्छा विकल्प है। पूजा में इस्तेमाल हुई सामग्री को जल में प्रवाहित करने के बजाय उसका उचित निपटान करना चाहिए।
क्या ज्वारे घर में रखे जा सकते हैं?