युग के बारे में कहा जाता है कि एक युग लाखों वर्ष का होता है, जैसा कि सतयुग लगभग 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष और कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का बताया गया है।
ek yug mein kitne varsh hote hain: युग के बारे में कहा जाता है कि एक युग लाखों वर्ष का होता है, जैसा कि सतयुग लगभग 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष और कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का बताया गया है। यह भ्रम कैसे फैला? किसी ने अपने प्रवचन में कह दिया तो सभी उसे मानने लगे या किसी ने श्लोकों का गलत अर्थ निकाल लिया या अनुवाद करते वक्त अपने मन से कुछ जोड़ दिया तो उस गलत अर्थ का ही प्रचलन हो चला। इसे समझने के लिए शास्त्र प्रमाण से ही इसे सिद्ध किया जा सकता है कि युग कितने वर्षों का होता है। जानिए विस्तार से...
पहले समझो दिन और रात के चक्र को
हमारे ऋषि मुनियों ने प्रत्येक ग्रह के समय या काल की गणना को एक साथ बताया है। जैसे धरती की समय गणना सूर्योदय और सूर्यास्त पर निर्धारित है उसी तरह प्रत्येक ग्रह के समय की गणना भिन्न भिन्न है। जैसे धरती पर एक दिन 24 घंटे का होता है और बृहस्पति पर एक दिन 10 घंटे का होता है। इस मान से ही वहां का माह और वर्ष निर्धारित होंगे। इस मान से हमारे चंद्रमा, मंगल, शुक्र, बुध और शनि आदि ग्रहों के दिन रात का समय अलग अलग है। हिंदू ग्रंथों में इन सभी का वर्णन है। धरती के मान से ही उन्होंने देवता और ब्रह्मा के लोक के समय और युग का निर्धारण किया है जिसे धरती का समय और युग मान लिए जाने की भूल की गई।
हिंदू समय मापन पद्धति को समझें
गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत के शांतिपर्व के अध्याय संख्या 231 में धरती के काल के स्वरूप का वर्णन मिलता है। इस वर्णन के अनुसार एक पलक के झपकने को निमेष कहते है। इसी निमेष को वर्तमान में सेकंड माना जा सकता है। 15 निमेष की एक काष्ठा होती है और 30 काष्ठा की एक कला होती है। 30 कला का एक मुहूर्त होता है। 30 मुहूर्त का एक दिन-रात होता है।
अहोरात्रे विभिजते सूर्यो मानुषलौकिके।
रात्रि: स्वप्नाय भूतानां चैष्ठायै कर्मणामह:।।15।।
अर्थात मनुष्यलोक के दिन-रात का विभाग सूर्यदेव करते हैं। रात्रि प्राणियों के सोने के लिए है और दिन काम करने के लिए।
पित्र्ये रात्र्यहनी मास प्रविभागस्तयो: पुन:।
शुक्लोह: कर्मचेष्ठायां कृष्ण स्वप्नाय शर्वरी।।16।।
अर्थात मनुष्यों के एक मास में पितरों का एक दिन-रात होता है। शुक्ल पक्ष उनके काम-काज करने का दिन और कृष्ण पक्ष उनके विश्राम का दिन है।
देवे रात्र्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयो: पुन:।
अहस्तत्रोदगयनं रात्रि: स्याद दक्षिणायम।।17।।
अर्थात मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर का है, उनके दिन-रात का विभाग इस प्रकार है। उत्तरायण उनका दिन और दक्षियायन उनकी रात्रि।
ये ते रात्र्यहनी पूर्वकीर्तिते जीवलौकिके।
तयो: संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यह: क्षपे।।18।।
पृथक् संवत्सराग्राणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश:।
कृते त्रेतायुगे चैव द्वापरे च कलो तथा।।19।।
अर्थात: पहले मनुष्यों के जो दिन-रात बताए गए हैं उन्हीं की संख्या के हिसाब से अब में ब्रह्मा के दिन-रात का मान बताता हूं। साथ ही सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग- इन चारों युगों की वर्ष संख्या अलग-अलग बताता हूं।
चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षानां तत्कृतं युगम।
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधि:।।20।।
अर्थात चार हजार वर्षों का एक कृतयुग (सतयुग) होता है। सतयुग में चार सौ वर्षों की संध्या होती है और इतने ही वर्षों का एक संध्यांश भी होता है।
इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु।
एक पादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च।।21।।
अर्थात संध्या और संध्यांशों सहित अन्य तीन युगों में यह संख्या क्रमश: एक-एक चौथाई घटती जाती है।
एतां द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां कवयो विदु:।
सहस्रपरिवर्तं तद् ब्राह्मं दिवसमुच्यते।।29।।
अर्थात: इस प्रकार बाहर हजार वर्षों का एक चतुर्युग होता है, यह विद्वानों की मान्यता है। इस तरह एक सहस्र बार परिवर्तन होने के बाद ब्रह्मा का एक दिवस मुक्त होता है।
महाभारत के उपरोक्त श्लोक के अनुसार यह सिद्ध होता है कि सतयुग करीब 4 हजार वर्षों का होता है। फिर सतयुग जब समाप्त होने वाला होता है तो उसका संध्याकाल करीब 400 वर्षों का होता है। इसी के बाद से जब अगले युग प्रारभ होते है तो उसका संध्या और संध्यांशों क्रमश: एक-एक चौथाई घटता जाता है। उपरोक्त मान से वर्तमान में सतयुग काल चल रहा है। संदर्भ: महाभारत शांतिपर्व-
अध्याय नाम एकत्रिंशदधिकद्विशततमोsध्याय: शुकदेवजी का प्रश्न और व्यासजी का उत्तर। श्लोक 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20 और 29।