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Durga Kavach: बुरी शक्तियों को दूर रखता है श्री दुर्गा रक्षा कवच, रोज पाठ करने से बरसती है देवी मां की कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Durga Raksha Kavach: श्री दुर्गा रक्षा कवच एक शक्तिशाली वैदिक स्तोत्र है, जो मां दुर्गा की कृपा और रक्षा प्राप्त करने के लिए पढ़ा जाता है। इसे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

श्री दुर्गा रक्षा कवच
श्री दुर्गा रक्षा कवच हिंदू धर्म में एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है, जो मां दुर्गा की असीम कृपा और रक्षा प्राप्त करने का माध्यम है। यह कवच मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसे मां भगवती के भक्तों के लिए संकटमोचन, भय नाशक और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है। चाहे वह शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक हो या बाहरी शत्रुओं से उत्पन्न खतरा, यह कवच भक्त को हर प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। 
देवी दुर्गा  शक्ति, करुणा और विजय की प्रतीक हैं। इस कवच के माध्यम से अपने भक्तों को अभेद्य रक्षा कवच प्रदान करती हैं। इसे नियमित रूप से पढ़ने से न केवल भय और अनिश्चितता का नाश होता है, बल्कि आत्मविश्वास, सकारात्मक ऊर्जा और आंतरिक शांति की प्राप्ति भी होती है। विशेष रूप से नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार या किसी भी संकट के समय इस कवच का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह कवच भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में विजय और समृद्धि का आशीर्वाद देता है। 

श्री दुर्गा रक्षा कवच

ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच:
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह।।

ब्रह्मोवाच:

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने।।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टा च कुष्माण्डा चतुर्थकम्।
पञ्चमं स्कन्दमाता च षष्ठं कात्यायनी तथा।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरी चाष्टमम्।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।।
शिरो मे शैलपुत्री रक्षेत्, ललाटं ब्रह्मचारिणी।
चन्द्रघण्टा च नेत्रयोः, कुष्माण्डा नासिकायाम्।
स्कन्दमाता च कर्णयोः, कात्यायनी च ओष्ठयोः।
कालरात्री च दन्तेषु, महागौरी च चिबुके।
सिद्धिदात्री सर्वत्र, सर्वं मे रक्षति सर्वदा।।
पूर्वतः पातु मां चण्डी, आग्नेय्यां कात्यायनी।
दक्षिणे पातु मे गौरी, नैऋत्यां स्कन्दमाता च।
पश्चिमे पातु मे दुर्गा, वायव्यां चण्डिका स्वयम्।
उत्तरे पातु मे भद्रा, ऐशान्यां सर्वसिद्धिदा।
ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मी, पाताले शारदा स्वयम्।।
सर्वं मे रक्षति दुर्गा, सर्वं मे रक्षति चण्डिका।
सर्वं मे रक्षति गौरी, सर्वं मे रक्षति पार्वती।।

फलश्रुति:

य इदं कवचं पुण्यं पठति श्रद्धयान्वितः।
सर्वं तस्य भवेत् सिद्धं, दुर्गा रक्षति सर्वदा।
न तस्य जायते व्याधि, न च शोकं भयं न च।
सर्वं तस्य भवेत् सौख्यं, सर्वं तस्य भवेत् शुभम्।।
इति श्री दुर्गा रक्षा कवचं सम्पूर्णम्।

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