Anusuya Devi Temple: उत्तराखंड के चमोली जिले में मंडल घाटी के घने जंगलों और हिमालय की गोद में बसा अनुसूया माता मंदिर एक ऐसा तीर्थस्थल है, जो अपनी पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यह मंदिर माता अनुसूया को समर्पित है, जो ऋषि अत्रि की पत्नी और अपने सतीत्व के तेज के लिए विख्यात थीं। इस स्थान से श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। साथ ही निसंतान दंपति संतान की प्राप्ति की कामना लेकर यहां आते हैं। आइए, जानते हैं अनुसूया माता मंदिर के इतिहास...
त्रिदेवों को शिशु बनाने वाली सती अनुसूया
अनुसूया माता मंदिर की सबसे प्रसिद्ध कथा उनके सतीत्व और तपोबल से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता अनुसूया प्रजापति कर्दम और देवहूति की नौ कन्याओं में से एक थीं और सप्तऋषियों में से एक महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। उनकी पति-भक्ति और सतीत्व का तेज इतना प्रबल था कि देवताओं को भी इसका अनुभव होता था। इस कारण उन्हें सती अनुसूया के नाम से जाना जाता है।
कथा है कि माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती को अनुसूया के सतीत्व से ईर्ष्या हुई। उन्होंने अपने पतियों- ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अनुसूया की पवित्रता की परीक्षा लेने के लिए भेजा। त्रिदेव साधु वेश में अनुसूया के आश्रम पहुंचे और उनसे भिक्षा मांगी, लेकिन एक शर्त रखी कि वह भिक्षा केवल निर्वस्त्र होकर दे सकती हैं। अनुसूया ने अपने तपोबल से त्रिदेवों की मंशा को समझ लिया और अपनी सती शक्ति से उन्हें शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने तीनों को पालने में डालकर माता की तरह उनका पालन-पोषण किया।
जब त्रिदेव लौटने में विलंब हुआ तो देवियां चिंतित होकर अनुसूया के पास पहुंचीं और क्षमा मांगी। अनुसूया ने त्रिदेवों को उनके मूल रूप में लौटाया। त्रिदेवों ने प्रसन्न होकर अनुसूया को वरदान दिया कि उनके यहां त्रिदेवों के अंश से एक पुत्र का जन्म होगा। यहीं पर दत्तात्रेय भगवान का जन्म हुआ, जिन्हें त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु, शिव का संयुक्त अवतार माना जाता है। इस कथा के कारण अनुसूया माता को संतानदायिनी माना जाता है और यह मंदिर निसंतान दंपतियों के लिए विशेष महत्व रखता है।
मंदिर का इतिहास और स्थापना
अनुसूया माता मंदिर का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है, जब यह स्थान ऋषि अत्रि और माता अनुसूया की तपोभूमि था। माना जाता है कि यहां उनकी कुटिया थी, जहां उन्होंने तपस्या की और त्रिदेवों की परीक्षा ली। समय के साथ इस स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ, जो कत्यूरी शैली की वास्तुकला को दर्शाता है। मंदिर के गर्भगृह में माता अनुसूया की भव्य पाषाण मूर्ति स्थापित है, जिसके ऊपर चांदी का छत्र है। मंदिर परिसर में भगवान दत्तात्रेय की प्राचीन शिला और पास में ही अत्रि मुनि की गुफा भी है, जहां उनकी पाषाण मूर्ति विराजमान है। मंदिर के पास अमृत गंगा जलप्रपात एक अनूठी विशेषता है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। यह जलप्रपात श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है और इसे बिना लांघे परिक्रमा करने की परंपरा है। मंदिर के रास्ते में भगवान गणेश की एक विशाल शिला मूर्ति भी है, जो विश्राम की मुद्रा में दर्शाई गई है।
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