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Bhagvad Gita:  शरीर और आत्मा को अलग अलग क्यों देखना चाहिए ! क्या कहता है गीता का सिद्धांत?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvad Gita: भगवद् गीता का दर्शन हमें जीवन का गहरा सत्य सिखाता है। 'आत्मा अमर है, शरीर नश्वर।' गीता के अनुसार, मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसका शरीर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। 

Bhagvad Gita
Bhagvad Gita In Hindi: भगवद् गीता का दर्शन हमें जीवन का गहरा सत्य सिखाता है। 'आत्मा अमर है, शरीर नश्वर।' गीता के अनुसार, मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसका शरीर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। शरीर मात्र एक वस्त्र की तरह है, जिसे आत्मा समय-समय पर त्यागती और धारण करती रहती है। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़े उतारकर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करती है।

शरीर और आत्मा को अलग देखने का अर्थ है , भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठकर अपने अंतरात्मा को पहचानना। जब हम केवल शरीर को ही 'मैं' मान लेते हैं, तो सुख-दुःख, हानि-लाभ, उम्र और मृत्यु का भय हमें बाँध लेता है। लेकिन जब हम समझते हैं कि आत्मा अविनाशी है, तो यह भय समाप्त हो जाता है और जीवन में स्थिरता, शांति और विवेक का भाव आता है।

गीता का यह सिद्धांत हमें कर्मयोग का भी संदेश देता है कि हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए, पर उनके फल से आसक्त नहीं होना चाहिए। शरीर कर्म का माध्यम है, जबकि आत्मा साक्षी है। जो व्यक्ति आत्मा के स्तर पर जीना सीख लेता है, वह न अहंकार से बंधता है, न मोह से। 

इसलिए गीता कहती है कि शरीर अस्थायी है, पर आत्मा सनातन है। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, वह जीवन के हर उतार-चढ़ाव में स्थिर, निडर और शांत बना रहता है। वही सच्चा ज्ञानी और मुक्त आत्मा है।
 

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

 

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