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Adhyatmik unnati kaise kare: कैसे करें स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति? जानिए इसके 3 सूत्र

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
निधि
सार

Adhyatmik unnati kaise kare: हम सभी अपने जीवन में उन्नति चाहते हैं। फिर चाहे वह धन या ऐश्वर्य की उन्नति हो, मान-सम्मान की उन्नति हो या पद-प्रतिष्ठा आदि की उन्नति हो।

Adhyatmik unnati kaise kare:

Adhyatmik unnati kaise kare: हम सभी अपने जीवन में उन्नति चाहते हैं। फिर चाहे वह धन या ऐश्वर्य की उन्नति हो, मान-सम्मान की उन्नति हो या पद-प्रतिष्ठा आदि की उन्नति हो। परंतु एक उन्नति ऐसी है जो हमारे हाथ में है और वो उन्नति यदि हमने हासिल कर ली तो बाकी सारी उन्नति अपने आप हो जाती है। परन्तु उसको बढ़ाने का काम शायद कम ही लोग करते या जानते होंगे। जी हां और वह उन्नति है आत्मिक या आध्यात्मिक उन्नति। इस बारे में कोई नहीं सोचता है क्योंकि उन्हें तो न इसके लाभ पता है और न ही यह पता है कि हमारे जीवन के लिए यह कितनी जरूरी है। तो आओ जानते हैं विस्तार से कि यह उन्नति होती कैसे है....

1. शुभ वाणी: यदि आप आध्यात्मिक उन्नती चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी वाणी पर ध्यान दें। कई लोग वाणी द्वारा खुद को और दूसरे को हानि पहुंचाते रहते हैं। गलत शब्दों का प्रयोग करके किसी के मन को दुखी करते रहते हैं। अच्छा बोलने से हम दुसरों को अच्छा अनुभव करा सकते हैं और व्यर्थ के वाद-विवाद से भी बच सकते हैं। इसका फायदा यह है कि इससे मन भी शुद्ध होने लगता है।

2. सब की भलाई : आज का मनुष्य सिर्फ खुद के भले के बारे में सोचता है। यह सोचना तब तक सही है जब तक कि आपके कार्य से किसी दूसरे को नुकसान न हो। किसी का बुरा करके अपना हित साधना ठीक नहीं है, इससे हमें कभी भी आत्मिक शांति नहीं मिल सकती। बाद में कभी भी इसका पछतावा होता ही है। इसलिए सदैव अपने कर्मों पर ध्यान दें और रोज किसी न किसी का भला करें। कहते भी हैं कि कर भला तो होगा भला।

3. उत्तम पुरुष बनना : आज की युवा पीढ़ी गलत राह अपनाती जा रही है। भौतिकता में ज्यादा रहकर, गलत संगत में रहकर गलत खानपान कर रही है। उसे सही-गलत का विचार करना चाहिए और मन के बहकावे में न आकर अपनी आत्मा की आवाज को सुनना चाहिए। मन को मजबूत और संकल्पवान बनाने के लिए उसे व्रत रखना, एकांत चिंतन करना, हमारा लक्ष्य क्या है और हमारा आश्रय (संगत) क्या है? इसको देखना और सुधारना होगा। आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह जरूरी है।

4. वर्तमान में रहना : यदि हमें जीवन में खुश रहना है तो अतीत के बुरे अनुभव से सीख लेकर उन्हें भूल जाना चाहिए और अच्छे अनुभव को संभालकर रखना चाहिए। हमेशा प्रसन्न रहने के लिए यह जरूरी है कि हम बुरे अतीत को भूल जाएं भविष्य की भी चिंता नहीं करें। तभी आप अपने वर्तमान में रहकर अपने वर्तमान को सुधार सकते हैं। वर्तमान सुखद है तो भविष्य भी ऐसा ही होगा। वर्तमान सुधरा तो भविष्य खुद-ब-खुद सुधर जाएगा।

5. सभी के प्रति अच्छी भावना: यदि हमने कुछ अच्छा कार्य किया या कुछ हासिल किया है तो हममें घमंड का भाव नहीं होना चाहिए। ईश्वर या अस्तित्व के प्रति धन्यवाद का भाव होना चाहिए और किसी और ने कुछ अच्छा किया है तो उसके प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं रखना चाहिए बल्कि उससे सीख लेकर आगे प्रयास करना चाहिए। तभी मन भी अच्छा रहेगा और आत्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति भी तभी संभव होगी।

6. जुड़ाव : आपका अपने इष्ट या ईश्वर के साथ निरंतर एक निस्वार्थ जुड़ाव होना चाहिए। अपनापन होना चाहिए। कुछ प्राप्त करने के लिए ईश्वर से न जुड़े बल्कि आप जिस तरह अपने माता, पिता, भाई बहन आदि से जुड़ते हैं, इसी तरह उन्हें भी घर का एक सदस्य समझकर ही जुड़ना चाहिए। यह जुड़वा आपको अध्यात्म के रास्ते पर ले जाएगा और जीवन में एक भरोसा कायम करेगा।

7. लगातार सीखना और अध्ययन करना : हमें अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने के लिए लगातार सीखना और अध्ययन करते रहना चाहिए। आत्मज्ञान के लिए स्वाध्याय के साथ ही शास्त्रों के ज्ञान को भी अर्जित करते रहने चाहिए। इसके लिए स्वयं अध्ययन करें, सत्संग सुनें या कल्पवास में रहें। कल्पवास का अर्थ होता है एक निश्चित काल के लिए संन्यासियों के साथ उनके आश्रम या नदी के तट पर शिविर लगाकर रहना और सेवा, ध्यान, साधना, सत्संग आदि करना।

आध्यात्मिक उन्नति के 3 सूत्र: (3 Principles Of Spiritual Growth)

- स्वाध्याय यानी स्वयं का और शास्त्रों का अध्ययन करना।

- कल्पवास यानी संतों के संग रहकर सत्संग का लाभ लेना।

- निरंतर ध्यान करते रहना या ईश्वर की प्रार्थना करना।

आध्यात्मिक उन्नति के लाभ:- (Benefits Of Spiritual Progress)

- निराश, अवसाद और अशांति से मुक्ति।

- उत्साह, सकारात्मक सोच, प्रसन्नता के बल पर सफलता।

- मृत्यु के बाद की यात्रा में सुगमता।

पुनश्च यदि आप आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो अपने मन के अच्छे और बुरे विचारों पर ध्यान दें। अपने कर्मों को शुद्ध करने के बारे में विचार करते रहें। इसे ही योग में स्वाध्याय कहते हैं और ईश्वर से जुड़ाव को ईश्वर प्रणिधान कहते हैं। इसी के साथ यदि आप वर्ष में एक बार या त्रैवार्षिक कुंभ में कल्पवास को अपनाते हैं तो आपकी आध्यात्मिक उन्नति जरूर होगी। इससे वानप्रस्थ के साथ ही संन्यास आश्रम में सुख ही सुख मिलेगा। जीवन में हमेशा सकारात्मकता और प्रसन्नता बनी रहेगी। तो कहीं से भी शुरू करें अपनी आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत।

- शैली प्रकाश

( जीवांजलि के अध्यात्म के लिए)

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