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Vaikunth Aur Golok Mein Antar: कैसा दिखता है भगवान श्री कृष्ण का गोलोक, जानें गोलोक और बैकुंठ धाम में अंतर

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Vaikunth Aur Golok Mein Antar: धार्मिक पुराणों में कई लोकों के बारे में सूना होगा, जैसे नाग लोक, पाताल लोक, ब्रह्म लोक इत्यादि। लेकिन उन सारे लोकों में सबसे सुंदर और अनोखा वर्णन गोलोक के बारे में मिलता है।

Vaikunth Aur Golok Mein Antar
Vaikunth Aur Golok Mein Antar: धार्मिक पुराणों में कई लोकों के बारे में सूना होगा, जैसे नाग लोक, पाताल लोक, ब्रह्म लोक इत्यादि। लेकिन उन सारे लोकों में सबसे सुंदर और अनोखा वर्णन गोलोक के बारे में मिलता है। बता दें कि यह जिस तरह श्री कृष्ण सभी को मोहित करते हैं ठीक उसी प्रकार गोलोक की सुंदरता भी मोहित कर देने वाली है।

पुराणों के अनुसार, गोलोक, भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान हैं, जहां पर वे श्री राधा रानी और अन्य गोपियों के साथ निवास करते हैं। यहां पर हर रोज रासलीला, क्रीड़ाएं एवं महोत्सव होते रहते हैं। गोलोक में भगवान श्री कृष्ण तक पहुंचना ही हर आत्मा का परम लक्ष्य माना जाता है। वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले लोग मानते हैं कि श्री कृष्ण ही पर ब्रह्म हैं। भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान गोलोक धाम है। गर्ग संहिता व ब्रह्म संहिता में गोलोक के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है।

ग्रंथों और पुराणों में भी है गोलोक का वर्णन

गर्ग संहिता के अनुसार, गोलोक धाम को वृन्दावन, साकेत, सनातन आकाश, परम स्थान, परम लोक या वैकुंठ भी कहा जाता है। बता दें कि इस स्थान को सांसारिक मोह-माया से परे इस धाम को प्रेम और भक्ति का धाम भी कहा जाता है। वृंदावन धाम भगवान श्री कृष्ण की भांति ही अनंत है।

कहा जाता है कि जिस प्रकार श्री कृष्ण में तीन गुण- सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से परे हैं, ठीक उसी प्रकार वृंदावन धाम भी इन तीनों गुणों से परे हैं। भगवद् गीता में भी गोलोक के बारे में वर्णन किया गया है कि - मेरा परमधाम न तो सूर्य, न चंद्रमा और नहीं अग्नि द्वार प्रकाशित होता है। बल्कि जो लोग वहां पहुंच जाते हैं, वे इस भौतिक जगत में फिर कभी लौटते नहीं है। बल्कि वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं।

ब्रह्मवैवर्त के अनुसार, गोलोक वृंदावन वैकुंठ लोक से 50 करोड़ योजन ऊपर स्थित है। साथ ही यह 3 करोड़ योजन में भी फैला हुआ है। गोलोक ब्रह्मांड से बाहर भी तीनों लोकों से ऊपर ब्रह्म ज्योति में विद्यामा है। ब्रह्मवैवर्त के अनुसार, गोलोक के वाम भाग में शिव लोक है, जहां परमात्मा अपने शिव स्वरूप में विद्यामान हैं। वैकुंठ और शिव लोक भी गोलोक की भांति नित्य है। ये सभी लोक भौतिक या कृत्रिम सृष्टि से परे हैं।

आखिर कैसा दिखता है गोलोक

पुराणों और ग्रंथों के अनुसार, सभी वैकुंठ लोक कमल की पंखुड़ियों के समान हैं और उस कमल का प्रमुख भाग ही गोलोक है। कहा जाता है कि गोलोक सभी वैकुंठ का केंद्र है। गोलोक को तीन अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया है- गोकुल, मथुरा और द्वारका। बता दें कि गोलोक में निवास करने वाली गोपियां बाल सूर्य की भांति कांतिमान होती हैं। गोलोक के द्वार पर विभिन्न प्रकार की गायों का दर्शन होता है। वे गायें विभिन्न प्रकार के दिव्य आभूषणों से सज्ज और सफेद पर्वत के समान प्रतीत होती हैं। सभी गायों की पूंछ का रंग पीला है। गोलोक में गायों की रक्षा करने वाले ग्वाले और चरवाहे भी हैं।

वैकुंठ और गोलोक में क्या है अंतर

पुराणों और ग्रंथों के अनुसार, वैकुंठ का शाब्दिक अर्थ होता है, जहां कुंठा न हो। यानी वैकुंठ पहुंचने के लिए सात दिव्य द्वारों को पार करना पड़ता है। साथ ही पुराणों और ग्रंथों में वैकुंठ धाम को वैकुंठ सागर भी कहा जाता है। वैकुंठ धाम समुद्र के तल में स्थित है। ग्रंथों के अनुसार, समुद्र के जिस गहराइ में वैकुंठ बसा हुआ है उस भाग को क्षीर सागर के नाम से जाना जाता है। गोलोक में जहां भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी रहते हैं, वहीं पर जगत के पालन हार भगवान श्री विष्णु और मां लक्ष्मी के साथ वैकुंठ में विराजते हैं।

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