विज्ञापन
Home  dharm  shiv ashtamurti bhagvan shiv ki 8 moortiyo ka rahasya jankar hairan rah jayege aap

Shiv Ashtamurti: भगवान शिव की 8 मूर्तियों का रहस्य जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे

जीवांजलि धार्मिक डेस्कPublished by:
कोमल
सार

Shiv ashtamurti: जिस तरह शिवलिंग के कई प्रका बताए गए हैं उसी तरह शिवजी की मूर्ति के भी प्रकार हैं। पुराणों अनुसार Bhagvan Shiv Ki 8 Moortiyo Ka Rahasya भगवान शिव शंकर को अष्टरूप में दर्शाया गया है। दरसअल वे ब्रह्मांड में 8 रूप में विद्यमान हैं। 

शिव अष्टमूर्ति

Shiv Ashtamurti: जिस तरह शिवलिंग के कई प्रका बताए गए हैं उसी तरह शिवजी की मूर्ति के भी प्रकार हैं। पुराणों अनुसार भगवान शिव शंकर को अष्टरूप में दर्शाया गया है। दरसअल वे ब्रह्मांड में 8 रूप में विद्यमान हैं। इन 8 रूपों के आधार पर Bhagvan Shiv Ki 8 Moortiya शिवजी की आठ प्रकार की मूर्तियां बताई गई हैं। आओ जानते हैं विस्तार से इस बारे में।

इन आठ प्रतिमाओं के नाम हैं:- 1.क्षितिमूर्ति (सर्व), 2.जलमूर्ति (भव), 3.अग्निमूर्ति (रूद्र), 4.वायुमूर्ति (उग्र), 5.आकाशमूर्ति (भीम), 6.यजमानमूर्ति (पशुपति), 7.चन्द्रमूर्ति (महादेव), 8.सूर्यमूर्ति (ईशान)। कहते हैं कि यह आठ मूर्तियां मनुष्य के शरीर के आठ अंगों की तरह हैं। इन्हीं अष्टमूर्तियों के तीर्थ स्थल भी हैं। जैसे क्षिति या सर्व लिंग तमिलनाडु के शिव कांची में अमरेश्वर मंदिर में स्थित हैं। इसे क्षितिलिंग एकाम्बरेस्वर शिवकांची भी कहते हैं।

1. क्षितिमूर्ति (सर्व या शर्वी)- इस मूर्ति का अर्थ है कि पूरे जगत को धारण करने वाली पृथ्वीमयी प्रतिमा के स्वामी शर्व है। शर्व का अर्थ भक्तों के समस्त कष्टों को हरने वाला। सर्व मूर्ति का अभिषेक करने वाले व्यक्ति के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। सर्व नामक मूर्ती अस्थिरूप में विद्यमान है।
 

2. जलमूर्ति (भव)- जल से युक्त मूर्ति को जलमूर्ति कहते हैं। जल शक्ति जीवन देने वाली शक्ति है। इस भव मूर्ति में संपूर्ण जगत को प्राणशक्ति और जीवन देने वाली कही गई है। भव का अर्थ संपूर्ण संसार के रूप में ही प्रकट होने वाला देवता।
 

3. अग्निमूर्ति (रूद्र)- रुद्र का अर्थ भयानक भी होता है जिसके जरिये शिव तामसी व दुष्ट प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। अग्नि रुद्र समान है। हमारे शरीर के भीतर और संपूर्ण जगत में अग्नि व्याप्त है जिसे ऊर्जा कहते है। संपूर्ण जगत के भीतर और बाहर व्याप्त समस्त ऊर्जा और उसकी गतिविधियों में स्थित इस मूर्ति को अत्यंत ओजस्वी मूर्ति भी कहा गया है जिसके स्वामी रूद्र है। यह रौद्री नाम से भी जानी जाती है।

4. वायुमूर्ति (उग्र)- सारा संसार में आयु और गति का आधार वायु ही है। हवा के बिना जीवन असंभव माना गया है। वायुरूप में शिव जगत को गति देते हैं और पालन-पोषण कर आयु भी प्रदान भी करते हैं। इस मूर्ति के स्वामी उग्र है, इसलिए इसे औग्री भी कहा जाता है। शिव के तांडव नृत्य में यह उग्र शक्ति स्वरूप उजागर होता है।
 

5. आकाशमूर्ति (भीम)- तामसी गुणों का नाश कर जगत को राहत देने वाली शिव की आकाशरूपी प्रतिमा को भीम कहते हैं। आकाशमूर्ति भैमी नाम से भी जानी जाती है। भीम का अर्थ विशालकाय और भयंकर रूप वाला होता है। शिव की भस्म लिपटी देह, जटाजूटधारी, नागों के हार पहनने से लेकर बाघ की खाल धारण करने या आसन पर बैठने तक सभी उनके कई तरह के भयंकर रूप उजागर होते हैं।
 

6. यजमानमूर्ति (पशुपति)- हमारे भीतर पशुवत वृत्तियों का नाश और उनसे मुक्त करने वाली मूर्ति को यजमानमूर्ति कहते हैं। इस मूर्ति को इसलिए पशुपति भी कहा जाता है। पशुपति का अर्थ पशुओं के स्वामी, जो जगत के जीवों की रक्षा व पालन करते हैं। यह सभी के नेत्रों में रमकर सभी आत्माओं की नियंत्रक भी है।


7. चन्द्रमूर्ति (महादेव)- चंद्र रूप की मूर्ति को महादेव स्वरूप की मूर्ति भी कहते हैं। देवों के देव महादेव यानी सारे देवताओं में सबसे विलक्षण स्वरूप और शक्तियों के स्वामी हैं महादेव। चंद्र रूप में शिव की यह साक्षात मूर्ति मानी गई है।


8. सूर्यमूर्ति (ईशान)- यह सूर्य जगत की आत्मा है जो जगत को प्रकाशित करता है। शिव की यह मूर्ति भी दिव्य और प्रकाशित करने वाली मानी गई है। शिव की यह मूर्ति ईशान कहलाती है। ईशान रूप में शिव को ज्ञान व विवेक देने वाला बताया गया है। शिव का एक नाम ईशान भी है।

- शैली प्रकाश

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel