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Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj: पहले खुद भोजन करें या भगवान को भोग लगाएं, स्वामी ईशान महेश जी ने बताया नियम

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी ईशान महेश जी महाराज
सार

Religious Beliefs: यदि किसी मजबूरी, बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी कारण से आपको पहले भोजन करना पड़ता है, तो निश्चिंत होकर भोजन करें और उसके बाद भगवान को भोग लगाएं। 
 

Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj
Bhog to God in Life: अक्सर कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी कारणवश उन्हें पहले भोजन करना पड़ जाए, तो क्या उसके बाद भगवान को भोग लगाया जा सकता है? विशेष रूप से वृद्धावस्था या बीमारी में कई बार दवाइयां लेने के लिए सुबह कुछ खाना आवश्यक हो जाता है। ऐसे में स्नान और पूजा से पहले भोजन करना पड़ता है। यही बात कई श्रद्धालुओं को मानसिक रूप से परेशान करती है कि कहीं वे कोई धार्मिक नियम तो नहीं तोड़ रहे।

धर्म का मूल आधार बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता है। यदि किसी व्यक्ति की परिस्थितियां ऐसी हैं कि उसे स्वास्थ्य कारणों से पहले भोजन करना आवश्यक है, तो इसमें कोई दोष नहीं माना जाना चाहिए। भगवान मनुष्य की मजबूरी और उसकी भावना दोनों को समझते हैं। वे केवल यह देखते हैं कि भक्त का हृदय कितना निर्मल और श्रद्धापूर्ण है।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पूजा करते समय रामकृष्ण परमहंस पहले स्वयं भोजन का स्वाद चखते थे और उसके बाद मां काली को भोग अर्पित करते थे। जब लोगों ने इसकी शिकायत की, तब उन्होंने सरल शब्दों में कहा कि यदि भोजन मेरे खाने योग्य ही नहीं है, तो मैं उसे मां को कैसे अर्पित कर दूं? उनका आशय यह था कि जिस प्रकार घर में अतिथि को भोजन देने से पहले उसकी गुणवत्ता देखी जाती है, उसी प्रकार भगवान को भी सर्वोत्तम वस्तु ही अर्पित की जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण नियमों से अधिक प्रेम और समर्पण का था।

हमें क्या सिखाते हैं शबरी के बेर?

रामायण का शबरी प्रसंग भी इसी सत्य को स्पष्ट करता है। शबरी भगवान श्रीराम के लिए बेर चुन-चुनकर चखती थीं ताकि उन्हें केवल मीठे फल ही मिलें। सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो वे जूठे फल थे, लेकिन भगवान राम ने उन्हें अत्यंत प्रेम से स्वीकार किया। भगवान ने यह नहीं देखा कि फल जूठे हैं, बल्कि यह देखा कि उनमें भक्त का निष्कलंक प्रेम और समर्पण भरा हुआ है। यही कारण है कि शबरी का प्रसंग आज भी भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।

धर्म का ही एक हिस्सा है स्वास्थ्य 

हमारे शास्त्रों में शरीर को धर्म पालन का प्रमुख साधन कहा गया है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं रहेगा, तो पूजा-पाठ, साधना और सेवा भी संभव नहीं होगी। इसलिए बीमारी, वृद्धावस्था या विशेष परिस्थितियों में स्वास्थ्य की आवश्यकता को प्राथमिकता देना उचित है। यदि डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा लेने से पहले भोजन करना आवश्यक है, तो पहले भोजन करना किसी प्रकार का पाप नहीं है। ऐसी स्थिति में अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना भी एक प्रकार का धर्म ही है।

गृहस्थ जीवन के अलग हैं नियम

अक्सर लोग साधुओं और तपस्वियों के नियमों को गृहस्थ जीवन पर लागू करने लगते हैं। जबकि दोनों की परिस्थितियां अलग होती हैं। गृहस्थ का पहला कर्तव्य अपने परिवार, स्वास्थ्य और जिम्मेदारियों का सही ढंग से पालन करना है। परिवार की सेवा, आपसी प्रेम, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा अपने कर्तव्यों का निर्वाह भी भगवान की सेवा का ही रूप है। इसलिए गृहस्थ को अनावश्यक अपराधबोध में नहीं जीना चाहिए।

सच्चे भाव से करना चाहिए समर्पण 

यदि किसी मजबूरी, बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी कारण से आपको पहले भोजन करना पड़ता है, तो निश्चिंत होकर भोजन करें और उसके बाद भगवान को भोग लगाएं। भगवान नियमों की कठोरता से अधिक भक्त के प्रेम, श्रद्धा और सच्ची भावना को स्वीकार करते हैं। इसलिए परिस्थितियों के अनुसार धर्म का पालन करें और मन में किसी प्रकार का भय या अपराधबोध न रखें। सच्चे भाव से किया गया समर्पण ही भगवान तक पहुंचता है।

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