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Rasraj Ji Maharaj: हनुमान जी धरती छोड़कर क्यों नहीं गए श्रीराम के साथ, रसराज जी महाराज ने बताया रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
रसराज जी महाराज
सार

Hanuman and Ram Story: हनुमान जी ने अपने लिए किसी दिव्य लोक का चयन नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस स्थान को चुना जहां प्रभु का नाम जीवित रहे। यही कारण है कि उन्हें भक्ति, सेवा, समर्पण और निष्ठा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। 
 

Rasraj Ji Maharaj
Hanuman Bhakti In Life: संत-महात्माओं ने हमेशा यह बताया है कि यह संसार स्थायी नहीं है। रसराज जी महाराज कहते हैं कि जो भी इस धरती पर आया है, उसे एक दिन जाना ही पड़ता है। इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए गुरुनानक ने कहा था कि "राम गयो, रावन गयो, जाको बहु परिवार। कहो नानक कछु स्थिर नहीं, सपने जू संसार।" अर्थात इस संसार में चाहे कितना भी बड़ा राजा हो, कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति हो या उसके पास कितना भी बड़ा परिवार क्यों न हो, अंततः सबको एक दिन इस संसार से विदा होना पड़ता है। यह संसार एक स्वप्न की तरह है, जो कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है।

भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण जैसे दिव्य अवतार भी अपनी लीला पूर्ण करके अपने धाम को लौट गए। लेकिन जब हनुमान जी की बात आती है, तो एक अद्भुत रहस्य सामने आता है कि वे आज भी धरती पर विद्यमान माने जाते हैं।

श्रीराम के धाम गमन का प्रसंग

रसराज जी महाराज ने एक कथा सुनाते हुए कहा कि जब भगवान राम ने अपनी पृथ्वी लीला पूर्ण कर ली, तब उन्होंने अयोध्या के लोगों को अपने साथ चलने का अवसर दिया। कहा जाता है कि जब वे सरयू नदी के तट पर पहुंचे और अपने दिव्य धाम की ओर प्रस्थान करने लगे, तब अयोध्या के असंख्य स्त्री-पुरुष, वृद्ध, बालक, पशु-पक्षी और अन्य जीव भी उनके साथ चल पड़े। सभी अपने प्रिय प्रभु का साथ छोड़ना नहीं चाहते थे। भगवान श्रीराम ने जब चारों ओर दृष्टि डाली तो देखा कि सभी उपस्थित हैं, लेकिन उनके परम भक्त हनुमान जी दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब उन्होंने हनुमान जी को बुलवाया और अपने पास आने के लिए कहा।
 

हनुमान जी का अद्भुत उत्तर

जब हनुमान जी प्रभु के सामने पहुंचे, तब श्रीराम ने उनसे कहा कि अब वे भी उनके साथ दिव्य लोक में चलें। यह सुनकर हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रता से पूछा कि प्रभु, आप मुझे कहां ले जाना चाहते हैं?" भगवान श्रीराम ने कहा कि वे अपने दिव्य धाम, वैकुण्ठ लोक की ओर जा रहे हैं और चाहते हैं कि उनके प्रिय भक्त भी उनके साथ चलें। लेकिन हनुमान जी का उत्तर सुनकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। हनुमान जी ने कहा, "प्रभु, आप भले ही वैकुण्ठ में निवास करते हों, लेकिन इस पृथ्वी पर जहां-जहां आपके नाम का स्मरण होता है, जहां आपकी कथा होती है, जहां आपके गुणों का गान किया जाता है, वहां मुझे आपके साक्षात दर्शन और अनुभव होते हैं।

राम नाम से जुड़ा हनुमान जी का संकल्प

हनुमान जी ने आगे कहा कि उन्हें इस धरती पर रहकर राम नाम की सेवा करनी है। उनके लिए सबसे बड़ा आनंद प्रभु की कथा सुनने और भक्तों के बीच रहने में है। उन्होंने श्रीराम से कहा कि जब तक इस संसार में कोई एक भी व्यक्ति "राम" नाम का उच्चारण करता रहेगा, जब तक रामकथा का श्रवण और कीर्तन होता रहेगा, तब तक वे इस पृथ्वी को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। यह केवल एक वचन नहीं था, बल्कि अपने आराध्य के प्रति उनकी अटूट भक्ति और प्रेम का प्रमाण था। हनुमान जी के लिए प्रभु से अलग कोई अस्तित्व नहीं है। वे जहाँ राम का नाम है, वहीं स्वयं को उपस्थित मानते हैं।
 

आज भी क्यों माने जाते हैं जीवित?

सनातन परंपरा में हनुमान जी को चिरंजीवी अर्थात अमर माना गया है। मान्यता है कि वे आज भी इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं और जहां सच्चे भाव से रामकथा, रामायण पाठ, सुंदरकांड या राम नाम का जप होता है, वहां उनकी उपस्थिति अवश्य रहती है। इसी कारण भक्तगण विश्वास करते हैं कि हनुमान जी केवल इतिहास या पुराणों के पात्र नहीं हैं, बल्कि आज भी अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, उनकी प्रार्थनाएँ सुनते हैं और उन्हें संकटों से उबारते हैं।

इस कथा का आध्यात्मिक संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल प्रभु के दर्शन की इच्छा नहीं होती, बल्कि उनके नाम, गुण और संदेश की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देना ही वास्तविक भक्ति है। हनुमान जी ने अपने लिए किसी दिव्य लोक का चयन नहीं किया, बल्कि उन्होंने उस स्थान को चुना जहां प्रभु का नाम जीवित रहे। यही कारण है कि उन्हें भक्ति, सेवा, समर्पण और निष्ठा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। इसलिए जब भी राम नाम का स्मरण किया जाता है, रामकथा का आयोजन होता है या भक्त श्रद्धा से श्रीराम का गुणगान करते हैं, तब यह विश्वास किया जाता है कि हनुमान जी वहाँ अवश्य उपस्थित होते हैं और अपने आराध्य श्रीराम की महिमा का आनंद लेते हैं।

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