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Pundarik Goswami Maharaj: स्नान के बाद भी अधूरी रह जाती है पवित्रता, पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ने बताया कैसे

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी
सार

Spiritual Lifestyle: स्नान के बाद केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा को भी पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए, और तिलक धारण करना इस दिशा में एक सरल तथा प्रभावशाली कदम है।
 

Pundarik Goswami Ji Maharaj
Importance of Cleanliness: प्रख्यात संत पुण्डरीक गोस्वामी के अनुसार, केवल स्नान कर लेना ही पूर्ण पवित्रता का प्रतीक नहीं है। स्नान से शरीर की बाहरी स्वच्छता तो हो जाती है, लेकिन आध्यात्मिक और मानसिक पवित्रता के लिए कुछ और बातों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। उनका कहना है कि जब व्यक्ति स्नान करके बाहर निकलता है, तब उसे अपने जीवन में ऐसी आदतों को शामिल करना चाहिए जो उसके मन, विचार और चेतना को भी शुद्ध करें। इसी संदर्भ में वे तिलक धारण करने के महत्व को विशेष रूप से बताते हैं।

महाराज जी बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में पवित्रता का अनुभव करना चाहता है, तो स्नान के बाद सबसे पहले अपने मस्तक पर तिलक लगाना चाहिए। तिलक केवल एक धार्मिक चिह्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। सदियों से ऋषि-मुनि, संत और भक्त तिलक धारण करते आए हैं। यह व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक लक्ष्य की याद दिलाता है और ईश्वर के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रकट करता है।

उनका कहना है कि तिलक लगाने में किसी प्रकार की झिझक या शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। यह हमारी सनातन परंपरा का गौरवशाली प्रतीक है। जिस प्रकार हम अपने पहनावे और व्यक्तित्व का ध्यान रखते हैं, उसी प्रकार तिलक भी हमारे आध्यात्मिक व्यक्तित्व की पहचान बन सकता है।

तिलक का आध्यात्मिक और मानसिक महत्व

महाराज जी के अनुसार तिलक का महत्व केवल धर्म तक सीमित नहीं है। वे बताते हैं कि मस्तक के मध्य भाग को विशेष ऊर्जा का केंद्र माना गया है। जब व्यक्ति श्रद्धा और भाव से उस स्थान पर तिलक लगाता है, तो उसके भीतर सकारात्मकता और एकाग्रता का विकास होता है। इससे मन को शांति मिलती है और व्यक्ति अपने कार्यों में अधिक सजग तथा संतुलित बनता है।

वे कहते हैं कि मनुष्य को किसी भी बात को केवल सुनकर स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि उसका अनुभव भी करना चाहिए। इसलिए कुछ समय तक नियमित रूप से तिलक लगाकर स्वयं इसके प्रभाव को महसूस करना चाहिए। जब व्यक्ति श्रद्धा के साथ इस अभ्यास को अपनाता है, तो उसके विचारों में शुद्धता और व्यवहार में सौम्यता आने लगती है।

तिलक से आती है आंतरिक शुचिता

सनातन धर्म में तिलक को आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की शुचिता का प्रतीक माना गया है। महाराज जी बताते हैं कि तिलक धारण करने से व्यक्ति को बार-बार यह स्मरण होता है कि उसे अपने जीवन को धर्म, सदाचार और ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर चलाना है। यही स्मरण उसे गलत कार्यों से दूर रखने में सहायता करता है। शास्त्रों में शरीर के विभिन्न अंगों पर तिलक लगाने का भी विधान बताया गया है, जिसे सर्वांग तिलक कहा जाता है। इसका उद्देश्य शरीर को भगवान के मंदिर के रूप में स्वीकार करना और प्रत्येक अंग को दिव्य चेतना से जोड़ना है। हालांकि आज की व्यस्त जीवनशैली में यह सभी के लिए संभव नहीं हो पाता, फिर भी कम से कम मस्तक के मध्य भाग में तिलक अवश्य लगाना चाहिए।

संकोच नहीं, श्रद्धा होनी चाहिए

महाराज जी अपने गुरुदेव की शिक्षा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आदर्श रूप से प्रतिदिन पूर्ण तिलक धारण करना चाहिए। लेकिन यदि कभी ऐसी परिस्थिति हो कि व्यक्ति को लगे कि तिलक लगाकर बाहर जाने में संकोच होगा, तब भी उसे तिलक का त्याग नहीं करना चाहिए। यदि मिट्टी या चंदन का तिलक लगाना संभव न हो, तो कम से कम जल से ही तिलक कर लेना चाहिए। उनके अनुसार यह विचार कि लोग क्या कहेंगे, आध्यात्मिक जीवन में बाधा बनता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया छोटा-सा धार्मिक आचरण भी व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। 

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