facebook pixel
विज्ञापन
Home  dharm  rohini vrat katha is vrat ki kahani padhne se ghar mein aati hai sukh samriddhi

Rohini Vrat Ki Katha: रोहिणी व्रत पर करें इस कथा का पाठ, जीवन में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Rohini Katha 2025: जैन धर्म में रोहिणी व्रत का विशेष महत्व है, जो हर माह रोहिणी नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष आश्विन माह में यह पवित्र व्रत 14 सितंबर 2025 को पड़ रहा है। 

Rohini Vrat Katha:
Rohini Vrat Katha: जैन धर्म में रोहिणी व्रत का विशेष महत्व है, जो हर माह रोहिणी नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष आश्विन माह में यह पवित्र व्रत 14 सितंबर 2025 को पड़ रहा है। यह व्रत न केवल आत्मिक शुद्धि और कर्म बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि पति की लंबी आयु, सुख-शांति और समृद्धि की कामना के लिए भी विशेष रूप से किया जाता है। खासकर महिलाएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ रखती हैं। इस दिन भगवान वासुपूज्य की पूजा और रोहिणी व्रत कथा का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि कथा के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। आइए, इस पवित्र व्रत की कथा के बारे में जानते हैं...

रोहिणी व्रत का महत्व

रोहिणी व्रत जैन धर्म के 27 नक्षत्रों में से एक- रोहिणी नक्षत्र से जुड़ा हुआ है। यह व्रत विशेष रूप से दिगंबर जैन समुदाय में प्रचलित है, हालांकि अन्य धर्म के लोग भी इसे उत्साह के साथ मनाते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संचित पापों का नाश होता है, आत्मा की शुद्धि होती है और घर में सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है। महिलाएं इस व्रत को अपने पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करती हैं, जबकि पुरुष और अविवाहित लोग भी इसे मोक्ष प्राप्ति और कर्म बंधनों से मुक्ति के लिए रख सकते हैं। यह व्रत कम से कम 5 वर्ष और 5 माह तक किया जाता है, जिसके बाद इसका उद्यापन किया जाता है।

रोहिणी व्रत की पौराणिक कथा

रोहिणी व्रत की पौराणिक कथा हस्तिनापुर और चंपापुरी नगर से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चंपापुरी नामक एक समृद्ध नगर था, जहां राजा माधव अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ राज करते थे। उनके सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम रोहिणी था। राजा माधव अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने एक प्रसिद्ध निमित्तज्ञानी यानी ज्योतिषी को बुलाया और पूछा कि उनकी पुत्री का विवाह किसके साथ होगा। निमित्तज्ञानी ने भविष्यवाणी की कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। इस भविष्यवाणी के आधार पर राजा ने रोहिणी का विवाह राजकुमार अशोक के साथ करवा दिया।

विवाह के बाद रोहिणी और अशोक हस्तिनापुर में सुखपूर्वक रहने लगे। रोहिणी अपनी शांत और सौम्य प्रकृति के लिए जानी जाती थी। एक दिन हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज का आगमन हुआ। राजा अशोक अपनी रानी और परिवार के साथ मुनिराज के दर्शन के लिए गए। मुनिराज ने सभी को धर्मोपदेश दिया। इस दौरान राजा अशोक ने मुनिराज से पूछा- मेरी रानी रोहिणी इतनी शांतचित्त और धार्मिक क्यों है? इसका रहस्य क्या है?

मुनिराज ने मुस्कुराते हुए रोहिणी के पिछले जन्म की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि हस्तिनापुर में ही एक राजा वस्तुपाल राज करते थे, जिनका एक मित्र धनमित्र था। धनमित्र की एक पुत्री थी, जिसका नाम दुर्गंधा था। दुर्गंधा के शरीर से हमेशा दुर्गंध आती थी, जिसके कारण धनमित्र उसकी शादी को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। एक दिन हस्तिनापुर में अमृतसेन मुनिराज आए। धनमित्र अपनी पुत्री को लेकर उनके पास गए और उसकी दुर्गंध की समस्या का कारण पूछा।

मुनिराज ने बताया कि दुर्गंधा का यह हाल उसके पिछले जन्म के कर्मों का फल है। पिछले जन्म में वह गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल की रानी सिंधुमती थी। एक बार राजा और रानी वन विहार के लिए निकले। रास्ते में राजा ने मुनिराज को देखा और रानी से उनके लिए भोजन की व्यवस्था करने को कहा। रानी ने आज्ञा तो मानी, लेकिन मन में क्रोध के कारण उसने मुनिराज को कड़वी तुंबी यानी कड़वा भोजन परोस दिया। यह भोजन खाने से मुनिराज को असहनीय पीड़ा हुई और उन्होंने प्राण त्याग दिए। इस पाप के कारण रानी को मृत्यु के बाद नर्क में दुख भोगने पड़े, फिर वह पशु योनि में जन्मी और अंत में धनमित्र की पुत्री दुर्गंधा के रूप में जन्म लिया।

धनमित्र ने मुनिराज से इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। मुनिराज ने कहा- सम्यग्दर्शन के साथ रोहिणी व्रत का पालन करें। प्रत्येक माह रोहिणी नक्षत्र के दिन चार प्रकार के आहार का त्याग करें। इस दिन श्री जिन चैत्यालय में जाकर सामायिक, स्वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा और अभिषेक करें। यह व्रत 5 वर्ष और 5 माह तक करें। धनमित्र और उनकी पुत्री दुर्गंधा ने मुनिराज की सलाह मानी और पूरे विधि-विधान के साथ रोहिणी व्रत का पालन किया। व्रत के प्रभाव से दुर्गंधा के पाप नष्ट हुए, और मृत्यु के बाद वह स्वर्ग में देवी बनी। बाद में वह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक की रानी रोहिणी के रूप में जन्मी। 

मुनिराज ने राजा अशोक के बारे में भी बताया कि उनके पिछले जन्म में किए गए पापों के कारण उन्हें भी कई कष्ट भोगने पड़े थे। लेकिन एक साधु की सलाह पर उन्होंने रोहिणी व्रत किया, जिसके फलस्वरूप वे स्वर्ग गए और फिर हस्तिनापुर के राजा बने। मुनिराज ने कहा कि रोहिणी और अशोक ने इस व्रत के प्रभाव से सुख और मोक्ष प्राप्त किया। जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ करता है, उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है और वह कर्म बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

यह भी पढ़ें:- 

Pradosh Vrat: दिन के अनुसार प्रदोष व्रत का महत्व, पहली बार रखने जा रहें तो नोट करें सही विधि 

Mahalakshmi Vrat 2025: महालक्ष्मी व्रत के दिन अवश्य करें ये उपाय, जीवन में बनी रहेगी खुशहाली! 

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel